Tuesday, August 30, 2011

Tapasvini Kavya Canto-9 (‘तपस्विनी’ काव्य नवम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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[Canto-9 has been taken from pages 163- 179 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ' Tapasvini : Ek Parichaya '
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-9]
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तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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नवम सर्ग
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सती का गर्भ-भार
धीरे-धीरे समयानुसार
हो चला गुरुतम
करके गुरुतर-भाव अतिक्रम ।
बैठ गयीं तो दुष्कर लगा उठना,
उठने से दुर्वह लगा शरीर अपना ॥

सती को इसी समय कष्ट होगा जान
वर्षा ने कर डाला ग्रीष्म का अवसान ।
श्रान्त प्राणों में शक्ति प्रदान करने
चतुर्दिशाओं में घिर उठे बादल घने ॥

ऊर्ध्व दिशा में सबने रोक सूर्यातप प्रबल
तान दिया अम्बर में चन्द्रातप श्यामल ।
चन्द्रातप-द्युति ने शम्पा-छटा से उसी क्षण
चकाचौंध कर दिये जनों के ईक्षण ॥

दिशांगनाओं ने नील वेणियाँ सँवार
खचित की बक-मोतीमाला उन पर ।
दिक्‌पालों ने सजा दिये सुन्दर बन्दनवार
रत्नाकर से रत्न-रेणु उठाकर ॥

पूर्व-दिगीश इन्द्र स्वार्थपर समुत्सुक
लज्जा त्याग बोले : ‘वह मेरा कार्मुक ।’
पश्चिम-दिक्‌पति रत्नाकर-अधीश्वर
बोले असहिष्णु होकर :
‘मेरे रत्नों से रचित वही
रहेगा मेरे समीप ही ॥’

अन्य दिक्‌पालों ने साधु धर्म मान
बारी का कर दिया समाधान,
उन दोनों के लिये पास अपने अपने
धनुष की स्थापना करने ॥

पुत्री-दुःख-सन्तप्ता रसा के सिर पर उस पल
वर्षा ने बरसाया जल सुशीतल ।
सरिता, सरोवर,
कानन, भूधर
सभी के सिर पर किया नीर सिञ्चन
स्वयं निष्पक्ष बन ॥

तृण-शस्यांकुर और कदम्ब-विकास रूपक
सञ्चरित हुआ धरित्री का पुलक ।
नीर से भरपूर
हो गया वसुधा का उर ॥

उभय तट उछल तमसा लगी चलने ;
सीता को आसन्न-प्रसवा निहार
मानो खुशियाँ लगीं उछलने
सभी के हृदय में अपार ॥

महीधर कानन सकल
छोड़ हृदय का अनल,
मलने लगे अपना अपना तन,
प्रफुल्ल हो उठे सारे वदन ॥

कण्टक-दुर्ग-वासिनी केतकी
होकर भी कण्टक-कलेवरा,
जैसे कहने लगी मधुर मुस्कान बिखरा :
‘ विपत्ति-विपिन में बँधी जानकी !
चिन्ता न करना अपने मन में ।
कण्टक-कानन में कण्टकिता मैं स्वयम्,
फिर भी वन्दिता हूँ सारे भुवन में
वितरण कर सौरभ मनोरम ॥

तापसी-वन में बनकर तपस्विनी धन्या
मनस्विनी ! तुम होगी विश्व-मान्या ।
लोगों की आँखें
जितना भी दूषण देखें,
वह क्या करेगा भला ?
अपना गुण जब दिव्यालंकार उजला ॥

कण्टक देखकर
यदि मधुकर
न दिखलाये मुझ पर अनुराग,
क्या सौरभ की स्पर्धा दूंगी त्याग ?‘

रमणीय कृष्णचूड़ा-पुष्प ने
प्रफुल्ल सौम्य वेश दिखला अपने
प्रलोभित किये सरस
दर्शकों के नयन मानस ॥

गजदन्त-पुष्प ने वसन्त समय से ठहर
वर्षा को दी सुमनों की खबर ।
कमल, मल्लिका और कुटज की कथा
उधर हुई अति प्रीतिदायिनी सर्वथा ॥

वर्षा ने उन्हें रत्न मानकर
किये बहुत यत्न प्रतिवासर ।
परन्तु कौन कर सकता अतिक्रम
विधाता का नियम ?

वर्षा कर न सकी
अपनी शक्ति से रक्षा उनकी ।
विनाश हुआ तीनों का
आया जब काल का झोंका ।
सती को चला पता यहीं,
आजीवन साधु उपेक्षित होता नहीं ॥

पुष्पालंकारों से सांवत्सरिक उत्सव मनाया
जूही लताओं ने मिलकर सकल ।
मानो सती का मानस बहलाने बनाया
वही सुगन्ध-महल ॥

अम्बुद-नीलाम्बरा श्रावणी विभावरी
हस्त-मस्तक में ले यूथिका रजनीगन्धा महकभरी,
सती-कुटीर के प्रांगण में खड़ी होकर
व्यथा मिटाने थी उजागर ॥

जानकी का प्रसव-लक्षण
प्रकाशित होने लगा आ प्रतिक्षण ।
सती का क्लेश लेकर
अदूर में अत्यन्त आर्त्त स्वर
दर्दूर सब रो पड़े
विकल हो बड़े ॥

चातक ने लेकर सती की तृषा
अम्बर में बारम्बार की वारिद से वारि-भिक्षा ।
वृद्धा तापसियाँ सती के समीप रहकर
समयोचित विधान में हुई थीं तत्पर ॥

निशा में निशामणि-कान्ति-हारक
सम्भूत हुए सती के यमज बालक ।
कुमारों की ज्योति ने मिल सौदामिनी के संग
दश दिशाओं में बिखरा दी आलोक-तरंग ॥

तोप गर्जन किया सानन्द पुरन्दर ने ;
न जाननेवाले लगे उसे ‘वज्र’ कहने ।
दिशांगनाओं की हुलहुलि-ध्वनि सहित
मिल गया मस्ती से मेघों का स्तनित ॥

सारे पर्वत कानन
बरसाने लगे सुमन ।
केदार, नदी, सरोवर
सब हो गये नृत्य-तत्पर ॥

कुमारों के दर्शनाभिलाषी घन
उतर आये नीचे धारा-रूप बन ।
पुलिनों के ऊपर उछल
चलने लगीं चञ्चल
सारी सरिताएँ उत्कण्ठित-मानसा
हृदय में भर दर्शन की लालसा ॥

मत्स्यगण त्याग सागर का अंग
लगे नृत्य करने तरंगिणी संग ।
झील-सरोवर-क्षेत्रों के अन्दर
उठ सलिल के ऊपर
सानन्द-मन कई मीन
हुए नृत्य में तल्लीन ॥

दर्शनेच्छुक ‘केउँ’ मछली
अतिशय उछलकर
सबके आगे चली
चढ़ ताल-तरु के शिखर ॥

महर्षि वाल्मीकि ने सत्वर पधार
सन्दर्शन किये युगल कुमार ।
सोचा उन्होंने साग्रह,
‘वृहस्पति शुक्र दोनों ग्रह
एक साथ चल
आश्रम-अम्बर में आये निकल ॥’

महर्षि का प्रभात-सा हृदय
आनन्द-पुष्पों से हो गया सौरभमय ।
कुश-गुच्छ लिये
हाथ में अपने,
अग्र पश्चात् द्विखण्ड किये
मन्त्रोच्चार सहित मुनिवर ने ॥

अनुकम्पा के हाथ सौंप बोले तपोधन :
‘देवी ! करो कुमारों का सम्मार्जन ।
कलेवर मार्जन करो अग्र खण्ड से अग्रज का
और निम्न खण्ड से अनुज का ॥’

अनुकम्पा ने किया सम्पन्न
जानकी-तनुजों का सम्मार्जन
मुनीश्वर के आदेश अनुसार,
भूतनाशिनी रक्षा उसी प्रकार ॥

कुश-लव के प्रयोग से सम्मार्जित अंग युगल (१)
शाणित रत्नों से भी हुए अधिक समुज्ज्वल,
जैसे तृण-युक्त वैश्वानर,
या सागर-तरंग-मुक्त नवल दिवाकर ॥

जब वैदेही लगीं निहारने
कुमारों के युगल आनन,
हुआ हृदय में अपने
सुख-दुःख का एक साथ आगमन ॥

सुख बोला : ‘गर्भ में अपने
धारण किये थे जिसने
सूर्य-चन्द्रोपम युगल कुमार,
धन्य वही जननी, धन्य शत बार ।
इससे अधिक सौभाग्य कहीं
संसार में दूसरा नहीं ॥’

दुःख बोला : ‘आज दोनों राजकुँवर
मणिमय भवन में लगते कितने सुन्दर ।
नरेन्द्र-हृदय में अपार आनन्द जगाते,
दीन दुःखियों की दरिद्रता दूर भगाते ॥

प्राप्त करते आज नगरवासीगण
कितने धन रत्न वस्त्र आभरण ।
मंगल नादों से भरा होता नगर,
मंगल वाद्यों से गूँज रहा होता अम्बर ।
ओह ! भाग्य-दोष से बन तापस-तनय
तापसों के आश्रम में लिया आश्रय ॥’

सती-नयनों से लेकर
सलिल दो धार,
दुःख चला गया सत्वर
देकर पुत्रों का प्यार ॥

निहार कुमारों के रूप उभय,
शुद्ध सुखमय हो गया सती का हृदय ।
उनका मन तभी
लगा नहीं तनिक-भी
चलाने अपने नेत्र
पुत्रों को छोड़ अन्यत्र ॥

मातृ-नेत्रज-स्नेह-समुज्ज्वल रंग
कुमारों के युगल अंग
रंगकर बारबार,
लाया उन नयनों में प्रतीति इस प्रकार,
मानो हैं उदीयमान
नवल हिमांशु और अंशुमान् ।
मानस में कर सिंहासन की स्थापना
दरशाया आनन्द ने सार्वभौमत्व अपना ॥

सहर्ष अनुकम्पा ने किया सम्पादन
शीघ्र कुमारों का नाभिच्छेदन ।
तदुपरान्त ले मन्त्र-पूत जल
अवगाहन कराके निभाये विधान सकल ॥

करने लगीं कोलाहल
निहार कुमार युगल
तापसियाँ आनन्द-गद्गद स्वर ।
रहे मुनिपुत्रगण पङ्क्तिबद्ध नृत्य-तत्पर
साथ-साथ करके संकीर्त्तन
श्रीराम-नाम पावन ॥

दुर्धर्ष दुर्जन लवणासुर का करने निधन,
वीरवर शत्रुघन
रहे थे प्रस्थान-पथ पर उसी रात
पावन वाल्मीकि-आश्रम में दैवात् ॥

आश्रम के उस आनन्द-नाद में
रमकर रिपुसूदन
स्वयं आनन्द-नद में
हो गये मगन ॥

अत्यन्त प्रफुल्ल-अन्तर
उन्होंने प्रशंसा कर
जानकी से कहा :
‘मातः ! आप हैं रघुवंश में पावनी,
सर्वंसहा आपकी जननी ।
इसी कारण आप भी स्वयं सर्वंसहा ॥

वसुमती-नन्दिनि ! आपने
वसु रखा था गर्भ में अपने ।
हमारा सौभाग्य महान् ।
किया रघुकुल को आज जो वसु प्रदान,
विराजेगा वह विभास्वर
अयोध्या-राजलक्ष्मी के मस्तक पर ॥’

मुनिकुमारों के आनन्द-कोलहल में उधर
सम्मिलित हो गये सारे विहंग,
दल-बद्ध होकर
कुरंगों के संग ॥

एक पल-सी बीत गयी विभावरी
श्रावणी वर्षिणी भयंकरी ।
लवण के प्रति सुमित्रा-पुत्र हुए अग्रसर
मुनि-चरणों में नमन पूर्वक सादर ॥

तापस-तापसियों को द्रव्य से करने प्रसन्न
लगा स्वभाव से सती का मन ।
परन्तु सती का वहाँ
इच्छानुरूप धन कहाँ ?
उन्होंने तो स्वयम्
आश्रय कर लिया है वनाश्रम ॥

चाहती चाँदनी विश्वभर
तृप्ति प्रदान करने,
परन्तु हाय ! गगन पर
छा गये बादल घने ॥

जब आईं जानकी
अपने भवन से,
मन में भावना थी उनकी
शीघ्र लौट चलेंगी वन से ।
मुनिकन्याओं के लिये लायी थीं उपायन
कुछ आभूषण और वसन ।
तापस-तापसियों के मन में सन्तोष लायीं सीता
उन्हें बाँटकर लज्जावश विनीता ॥

उन सबका हृदय-पारावार
करने लगा विस्तार
परम प्रसन्नता की लहर,
उन्हें चन्द्रकिरण-जैसे पाकर ॥

थे सती ने सञ्चित किये
जितने फल और नीवार,
सब बण्टन कर दिये
खग-मृगों को आहार ॥

खींचतान कर परस्पर
भक्षण किया सबने ।
चञ्चू से पकड़ तत्पर
कुछ विहंग लगे उड़ने ॥

सारिका-शावक नीड़ में अपने
बैठे थे खोल वदन,
सस्नेह उन्हें उनकी माता ने
कर दिया आहार बण्टन ॥

सहर्षनाद मयूरियों के संग मोर
हो गये वृक्षों पर अत्यन्त नृत्य-विभोर ।
कोकिल ने घूम द्वीप-द्वीपान्तर
प्रचार कर दी वह शुभ खबर ॥

कैलास को देने वही मंगल समाचार
चला राजहंस आनन्द-नाद पसार ।
रखा था गौरी को दिलाने विश्वास
मृणाल-किसलय का पत्र अपने पास ॥

समाचार से हृदय में भर उल्लास अत्यन्त,
शिवजी से करके निवेदन,
छोड़ अपना कैलास-सदन
सती के हाथों पूजा-प्राप्ति की अभिलाषिणी
गौरी षष्ठीदेवी-रूपिणी,
अम्बर में कादम्बिनी के संग विराज
जलद-ज्योति के व्याज,
पहुँच गयीं वाल्मीकि-आश्रम पर तुरन्त ॥

सप्त तापस-कन्याओं के कलेवर में
विराज सप्त-मातृका समान,
वर-भुजा गौरी ने षष्ठ वासर में
सती-हस्त की अर्चना स्वीकार सादर
समस्त अरिष्ट विनष्ट कर,
यमज पुत्रों को किया सिंह-बल प्रदान ॥

हुआ क्रम से दिवस उपनीत
नामकरण का अवसर पुनीत ।
कुमारों के नाम श्रवण के प्यासे
स्वर्गपुर त्याग उधर पधारे देवगण ।
देवियों ने उस उत्सुकता से
किया दलबद्ध होकर उनका अनुसरण ॥

शरत् काल के शुभागमन हेतु उधर
मार्ग छोड़ रहा था अम्बर में अम्बुधर ।
उस मार्ग पर सब रवि-तेज के सहित
अनायास चले ज्योतिर्मय स्यन्दन में विराजित ॥

आश्रम में पहुँच तब
सुमन-समूह में महक बन
अत्यन्त मन-मोहन,
बस गये सब
स्वर्गीय सुन्दरता बिखराकर
विकास के बहाने मुस्कुराकर ।
तापस-तापसियों के हृदय के भीतर
कुछ समा गये आनन्दमय होकर ॥

पाकर महर्षि वाल्मीकि का निदेश
द्विगुण आनन्दित-मन
तापस-तापसियों ने सत्वर
उपवन में करके प्रवेश,
लाकर कई नव पल्लव सुमन
की मण्डप रचना मनोहर ॥

निशीथिनी के प्रथम प्रहर में उधर
लगा अतिशय सुन्दर
आश्रम चित्ताकर्षक,
प्रज्वलित प्रदीप-मालाओं से ।
प्रचुर ऐंगुद तैल समस्त दीपक
लूट रहे थे तापसों के हाथों से ॥

चहुँदिशाओं में कुसुमित तरु-वल्लरियाँ
खिलखिला रही थीं पाकर रश्मि की ऊर्मियाँ ।
था वही समय सुमनों का त्योहार
चक्रवर्त्तिनी का बढ़ रहा था गर्व-भार ॥

समुद्रों में जैसे क्षीर-पारावार,
वृन्दारकों में पुरन्दर जिस प्रकार,
जैसे हिमगिरि के तुंग शृंगों में गौरीशंकर,
वैसे वाल्मीकि तपस्वी महान्
विराजे मुनियों में शोभायमान
मण्डप में आसन बिछाकर ॥

संग लेतीं युगल अश्विनीकुमार
छाया और संज्ञा जिस प्रकार,
वैसे कर-कमलों से थाम
यमज कुमार अभिराम
पधारीं मण्डप में सती और अनुकम्पा ।
आविर्भूत हुई शोभा वहीं सदर्पा ॥

कृष्ण-त्रयोदशी-शशी के पास निकली
भा रही नभ में
प्रभाती तारका ।
मानो खड़ी है प्राची मतवाली,
सरोवर-गर्भ में
धारण कर प्रतिबिम्ब उनका ॥

सीता की सहचरियाँ
प्रसन्न-मुख सरल-हृदया तापस-कुमारियाँ
सती-प्रदत्त वसनों से सुशोभना,
आवृत कर कलेवर अपना अपना
अतिशय प्रमुदित-अन्तर
बैठ गयीं सती के समीप उधर ।
प्राप्त कर उषा-प्रदत्त नयी किरण उज्ज्वल,
जैसे उषा के पास सरोजिनी सकल ॥

देवार्चना हुई सम्पन्न
वैदिक विधि के अनुसार,
हुआ मंगल शंख-स्वन
और तूर्यनाद का विस्तार ॥

ज्येष्ठ पुत्र को शुभाशीष देकर
बोले प्रसन्न-मन मुनिकुल-शेखर :
‘कुशाग्र-मार्जित इसका नाम होगा ‘कुश’,
बनेगा बैरी-वारणेन्द्र-गण का अंकुश ।’
महामनीषी मुनीश ने उसी प्रकार अभिनव
कनिष्ठ पुत्र का नाम रखा ‘लव’ ॥

राम-नाम उच्चारण किया मुनियों ने
बजाकर संग-संग
मन्दिरा, खञ्जनी और मृदंग ।
तापस-नन्दिनियों ने
वीणा बजाकर मांगलिक
गाये गीत सुधा से भी मधुर अधिक ॥

सुरभि-रूप धारण कर
समस्त अमरी अमर
हो गये वहाँ नृत्य-मगन
अपार आनन्दित-मन ।
चतुर्दिशाओं में स्थित मृग-मृगीगण
निहार रहे विस्मितेक्षण ॥

आश्रम के आनन्द-कोलाहल में वनभूमी ने
योगदान किया प्रतिध्वनि के बहाने ।
वल्ली पादप सभी मानो संगीत-तत्पर
हो गये विद्याधर-विद्याधरियों का गर्व अपनाकर ॥

आनन्द से जगमगा उठा आश्रम,
परन्तु सती के वदन-कुमुद में तम
राम-चन्द्र ही के बिना छा गया ।
उनका पर्व तो था अमावस्या ।
अन्धकार ने बढ़ाया गौरव उन्हींका,
अन्धकार के कारण ही आदर है चाँदनी का ॥

सती के नन्दन-रत्नद्वय सुन्दर
हुए उधर दृश्यमान,
रत्न-सानु के गभीर कन्दर
जैसे शोभायमान ॥

ऋषि-देवों ने मिल मनाकर आनन्द त्योहार
किया सती का गौरव विस्तार ।
स्वाभाविक रीति यह महाजन की,
सुपात्र को सम्मान देने में प्रीति उनकी ॥

अन्त में कुमारों के प्रति
कल्याण-कामना के बाद
प्रदान किया महामति
मुनिवर ने शुभाशीर्वाद ॥

तापसों के हृदय-कमल में आसन बसाकर
‘तथास्तु’ उच्चारने लगे समस्त अमर ।
गंभीर नाद में वन-पादप-लतिका सकल
‘तथास्तु’ कहने लगे आनन्द-विह्वल ।
‘तथास्तु’ उच्चारने लगे सुस्वर
दिशा-विदिशाओं से सारे दिगीश्वर ॥

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[पादटीका :
(१) कुश = द्वि-खण्डित कुशगुच्छ का अग्र खण्ड ।
लव = द्वि-खण्डित कुशगुच्छ का निम्न खण्ड । ]
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(तपस्विनी काव्य का नवम सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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Sunday, August 28, 2011

Tapasvini Kavya Canto-6 (‘तपस्विनी’ काव्य षष्ठ सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)
Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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[Canto-6 has been taken from pages 101-120 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘Tapasvini : Ek Parichaya'
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-6]
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तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


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षष्ठ सर्ग
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एक दिन अम्बर में उठ चले चन्द्रमा
साथ ले चित्रा प्रियतमा ।
वन में खिलने लगीं
विमल नवमालिकाएँ ।
विकसित पुष्प-गुच्छ धारण कर
प्रमुदित-अन्तर
धीरे-धीरे डोलने लगीं
आश्रम की मल्ली-लतिकाएँ ॥

माधवी-वकुल-मल्ली-नियाली
सुमनों का सौरभ सम्भार
ले मन्द-मन्द कर रहा स्वच्छन्द विहार
समीरण तमसा के पुलिन पर,
सुन्दर उजली
चाँदनी को गले लगाकर ॥

सती-कुटीर के निकट ले आकार
अनेक प्रकार,
तरु-छाया में खण्ड-खण्ड चन्द्र-रश्मियाँ कोमल
धीरे-धीरे प्राची दिशा की ओर आगे चल
घटाती थीं कभी अपना शरीर
कभी बढ़ाती, कभी छुपाती फिर ॥

जगमगा रही शीतल चाँदनी सुन्दर ;
बैठी थीं सती मैथिली
कुटीर से थोड़ी दूरी पर
साथ ले अपनी सहेली ।
सती के समीप चाँदनी ऐसी थी भा रही,
मानो सती के अंगों से निखर आ रही ॥

खद्योत युगल उसी समय
एक ही पत्र में ले आश्रय
रहे थे द्युति वितर
चन्द्र से भी सुन्दरतर ॥

उन्हें करके अवलोकन
कह रही थीं सती मन-ही-मन,
‘अरे खद्योतो ! धन्य हो तुम सभी
पतंग-जन्म लेकर भी ।
तुमसे बढ़कर अधिक
अनेक जीव हैं जग में वास्तविक,
फिर भी तुम्हारी भाँति
और हो सकती किसकी कान्ति ?
हो बड़े भाग्यवान्,
पाया था तुमने विश्वपति से वर महान् ।
उसी कारण कान्ति तुम्हारी
दुनिया के नयनों में भरती खुशी प्यारी ॥’

चक्रवाक-ध्वनि इसी समय दी सुनाई,
बारबार उसने करुणा बरसाई ।
सती-नेत्र-नदी के कपोल-पुलिन तक
उछल गया बरबस वही करुणा-उदक ।
सहेली से छुपा स्वेद के बहाने
आँचल से तुरन्त वदन पोंछ दिया सीता ने ॥

बात समझ बोली सहचरी :
‘कहो सुशीले ! आती जब विभावरी
चक्रवाक क्यों रोदन करते ?
क्या वे विहग रहते
नगर के भीतर ?
और वहीं रोते अर्ध-रात्रि में कातर ?

यदि वे करते रोदन,
नागरिकगण उधर
क्या सोचते मन-ही-मन
सुनकर उनका करुण स्वर ?’

जानकी यह सुन तत्काल
न सकीं आँसू सम्हाल ।
वहीं कण्ठ-स्वर उनका
रोधक हुआ वचन का ॥

यह देख बोली सहचरी :
‘छोड़ो उन बातों को, प्यारी अरी !
मेरी चपलता क्षमा कर दो कृपया,
अकारण ही तुम्हें कष्ट पहुँचाया ॥’

बोलीं जनक-कुमारी :
‘अरी सखी प्यारी !
प्रदान न करने से अपना परिचय
अस्थिर हो रहे हैं मेरे प्राण निश्चय ।
भरोसा है मन में मेरे,
शेष जीवन यहाँ बिताऊंगी संग तुम्हारे ॥

न कहूंगी अपनी बात तुम्हारे पास
तो रहेगा कैसे मुझ पर तुम्हारा विश्वास ?
कह देने से बोझ मेरे दुःख का
निश्चित हो जायेगा हल्का ।
उससे समझ लोगी संसार
है किस प्रकार ॥

सखी ! मैं राजकुमारी
सम्पत्ति की डोली में भली
राजनगर की प्यारी
सुहानी गोद में पली ॥

हंस, केकी, कोकिल, शुक सारिकाओं के विमोहन
मधुर स्वर में गूँज रहा राजभवन ।
था चक्रवाक उधर
रजनी में रोदन-तत्पर ।
उसके लिये वहीं
मेरे वाल्य-हृदय में दुःख था नहीं ॥

सखी ! ले ली वाल्यावस्था ने बिदाई ;
तरुणिमा जब छाई,
देखा मैंने उधर
पधारे अनेक देशों से अनेक नरेश्वर ॥

रखा था पिताजी ने एक धनुष रत्नमय,
वह मनोरम था अतिशय ।
एक एक सारे नरेश्वर,
बैठ जा रहे थे धनुष एकबार खींचकर ॥

वहीं रत्न-मुकुट में छुपाकर भला
अपने शुक्ल केश,
बल दिखलाने लगे कई नरेश ।
कुछ नरपाल यौवन-सम्पन्न,
किशोर-केशरी की भंगी दिखला
हट गये धनुष स्पर्श कर अवसन्न ॥

दर्पभरी गमन-भंगी संग साहस निष्फल
निहार उन लोगों के सकल,
हँसी आती थी मेरे मुख में तब ।
बैठ प्रासाद के ऊपर
मैं कौतुक-अन्तर
सखियों के संग देख रही सब ॥

पधारे अन्त में एक क्षत्रियकुल-शिरोमणि तभी
जिनकी ज्योति से निष्प्रभ लगता मरकत भी ।
धनुष के समीप हुए विराजमान
मानो राजपुत्र-रूप स्वयं अंशुमान् ॥

उन्हें दर्शन कर चुपचाप
द्रवित हो गया हृदय मेरा अपने आप ।
तापसी-जीवन में यहीं
वही अनुभव है नहीं ॥

उपहास किये थे कितने
नरेशों के प्रति मैंने ।
परन्तु आ गया तुरन्त
सारी चपलताओं का अन्त ॥

ऐसा सौम्य रूप दर्शन
कर पाएंगे मेरे नयन,
कभी तो भावना अपनी
थी नहीं मेरे मन में, सजनी ! ॥

उनके रक्तिम चरण-युगल में उसी क्षण
किया प्रणिपात अर्पण,
मेरे निर्मल हृदय ने सविनय
भक्ति-प्रीति से तन्मय ॥

था मेरे पिताजी का प्रण,
‘करेगा जो धनुष भंग
सम्पन्न करवाएंगे मेरा पाणिग्रहण
उसीके ही संग ॥’

सोचा मैंने, ‘उसी दिन ही
समाप्त हो गया प्रण वही ।
पिताजी की आज्ञा लेकर
तपस्विनी बन जाऊंगी सत्वर ॥

कौन भंग करेगा शरासन
इसमें निश्चित बात क्या ?
वीर-शिरोमणि ने तो मेरा मन
अब है क्रय कर लिया ॥

एक में मन हो अनुरागभरा
और पति मिले यदि कोई दूसरा,
जीवन में मृत्यु में तब अपनी
होगी दुर्गति दारुण घनी ॥

रम्य हस्त जिनका
भाजन है पुष्प-वाणासन का ।
उनका यह धनुष धारण करना
केवल अवमानना ॥’

मेरा था सौभाग्य मंगलमय,
वीरश्रेष्ठ ने उसी समय
कर दिया धनुष भंग
मेरा हृदय-सन्ताप भी संग-संग ॥

सम्पन्न हुआ उनके साथ यथारीति
मेरा परिणय मांगलिक ।
पाकर उनकी स्वर्गीय प्रीति
मैं धन्य हो गयी आन्तरिक ॥

वीर-प्रवर के थे अनुज त्रय,
मेरी तीनों भगिनियों से हुआ उनका परिणय ।
जब किया पितृ-पुर से पति-पुर प्रस्थान
स्वामी के हाथ एक धनुष ज्योतिष्मान्
अर्पण किया मेरे सामने
क्षत्रियकुल-केतु भार्गव-पुंगव परशुराम ने ॥

इस घटना को देखकर
मेरे मन में आ गया डर ।
होगा मेरे प्राणनाथ के सहित
अन्य किसी तेजोमयी नारी का मिलन,
जो बन जायेगी निश्चित
मेरी प्रीति की बैरन ॥

उसी धनुष में मेरे प्रिय स्वामी ने
किया जब शर-सन्धान,
अविलम्ब भार्गवी वीरलक्ष्मी ने
वर-माल्य पहनाया उन्हें ससम्मान ।
नलिनी के प्रति जैसे रश्मि सूर्य की,
वीरश्री ने बढ़ाई प्रीति मेरे हृदय की ॥

मानस ने एक बात सोच रखी,
फल दूसरा हो जाता ।
दुनिया में विधि का विधान, सखी !
समझ में नहीं आता ॥

तेजोमय वीर-केतन
अम्बर में फहराकर,
अग्रसर हुए उल्लसित-मन
मेरे प्रियतम वीरवर ॥

सम्पत्ति-कानन मेरा श्वशुरागार ;
आयी जब वहीं शुभ-वार्त्ता की बयार,
सादर उसे निहार
आनन्द का पुष्प-सम्भार
शोभा-तरु में लगा खिलने ।
लोगों का अन्तःकरण
कर लिया आकर्षण
प्रभा-पल्लव ने ॥

नव विवाहित चार वीर भ्रातृगण
दीप्यमान भाये धारण कर रत्नाभरण ।
उससे भी अधिक सजा वधुओं के वेश उज्ज्वल,
परम आनन्द से वे पधारे राजमहल ॥

आली ! उस राजभवन में एक थी वृद्धा,
उसी समय बातों में बरसने लगी प्रीति-सुधा ।
नक्षत्र-पुञ्जों से मनोहर
चतुर्दिशाओं के अम्बर
राजभवन में विराज
उसे मञ्जुल सजाने लगे आज ॥

देखा मैंने, भगिनियों के मुखमण्डल प्रसन्न,
नव प्रीति-लज्जा से थे लालिमा-सम्पन्न ।
उनमें स्वेद बिन्दु-बिन्दु निकल
रत्न-दीप्ति से दीप्तिमान् हो गये सकल ।
तुम्हारे स्वेदयुक्त ललाट पर
आज निहार सुन्दर
सुमधुर चाँदनी,
उस बात का स्मरण हो रहा, सजनी ! ॥

स्वर्ग-वैभव-भोग
जिसे कहते हैं लोग,
श्रवण उसे समझकर सच
मन में जगाता लालच ।
स्वर्ग-लालसा में नरेश्वर
राजसिंहासन त्याग कर,
वन में फलमूलाहारी बन
तपश्चर्या में रहते मगन ॥

सखी ! श्वशुर-भवन में
मैंने देखा जैसा,
सोचा, महेन्द्र के अमर-निकेतन में
कभी होगा नहीं वैसा ॥

श्वशुर-श्वश्रुओं के स्नेह कितने
और प्राणपति की अपार प्रीत ने
स्वर्ग-भुवन के प्रति
मेरे मन में जगायी हेय प्रतीति ॥

सम्पन्न हुए नव-नव
कितने भव्य महोत्सव ।
संसार में ऐसा होता, यही बात
नहीं थी मुझे ज्ञात ॥

किया मैंने समय अतिवाहित
पति के प्रेम-रत्न सहित
राजभवन के रत्नों के मनभावन
मयूख-सुख में होकर मगन ।
चक्रवाक के करुण स्वर करने श्रवण
मुझे निशिदिन अवकाश नहीं था एक क्षण ॥

बीत गये बारह
वर्ष इसी तरह,
बारह दिनों के समान
हुए मेरे मन में प्रतीयमान ॥

एक दिन मेरे समीप आकर
बोले सहास्य-वदन प्राणेश्वर :
‘आज की रजनी
अधिवास में बितायेंगे, सजनी !
तुम्हें हृदयालंकार बनाने की
अभिलाषा रख आन्तरिकी,
राजलक्ष्मी अर्पण करेगी कल
मुझे वर-माला सुमंगल ॥’

तब मैंने कहा :
‘प्राणेश्वर ! आपका पूर्ण रहा
जो स्वर्गीय अनुराग मुझमें यहीं,
विभाजित तो होगा नहीं ?’

वे बोले फिर :
‘यह स्वाभाविक हो ही भले,
झुक जाता राजलक्ष्मी का सिर
सती के चरणों तले ।
ऊपर चल नीर पारावार का
बादल बनता अम्बर में,
मंगल विधान कर संसार का
समा जाता पारावार के उदर में ॥’

मंगल विधि से भली
वही विभावरी बीत चली ।
मंगल वाद्य सबेरे
श्रुतिगोचर हुए बहुतेरे ॥

गये सचिव के साथ
पिताजी के समीप मेरे प्राणनाथ ।
वहींसे करके प्रत्यावर्त्तन
कहा मुझे दुःखभरा वचन :
‘जीवन-संगिनि ! पास तुम्हारे
समर्पित कर मेरे प्राण प्यारे
आज करता हूँ वनवास हेतु प्रस्थान
पिताजी की आज्ञा मान ।
युवराज होंगे मेरे प्रिय भरत भाई,
उनके प्यार में हैं राजलक्ष्मी आई ।
मानिनि ! त्याग तुम ज्येष्ठा का अभिमान
करोगी राजमान्य से भरत का सम्मान ॥’

स्वामी का मुखमण्डल प्यारा
मैंने उधर निहारा,
पहले की भाँति वह लगा
शान्ति से रहा था जगमगा ॥

करने कानन-गमन
चञ्चल हो रहा स्वामी का मन,
परन्तु मेरे लिये जैसे उनका हृदय
हो रहा था व्याकुल अतिशय ॥

मैं मान लेती परिहास
समस्त कथन उन्हींका,
मच गया उच्छ्‌वास
चतुर्दिशाओं में रुलाई का ॥

हाहाकार-नाद से अतिशय
भवन लगा काँपने,
मैंने सोचा साश्चर्य,
‘ये क्या अद्भुत सपने ॥’

‘जीवेश्वर !’ कहा मैंने चकित-मन,
‘यदि आप प्रस्थान करेंगे कानन में,
क्या रहा प्रयोजन
इस दासी का राजसदन में ?

मैं राज्ञी बननेवाली थी,
भिखारिन बनूंगी ।
वन में विहर प्रिय साथी
श्रीचरणों की सेवा करूंगी ॥

श्रीचरणों में मति मेरी,
श्रीचरणों में गति मेरी ।
आपके बिना मैं तनिक-भी
चाहती नहीं स्वर्ग-वैभव कभी ॥

आपके प्रिय अनुज रहेंगे
युवराज-पद पर विराजमान,
जब आप हँसते-हँसते करेंगे
कानन की ओर प्रस्थान ॥

अलंकृत करेंगी युवराज्ञी-पदवी
मेरी भगिनी माण्डवी ।
मैं न चलूंगी क्योंकर
आपके चरण-चिह्न की अनुगामिनी होकर ?

यदि उसी सुख से वञ्चित रहूंगी,
मैं जीवित नहीं रह पाऊंगी ।
प्रभु-चरण-सेवा के बिना सीता
समझती सारा संसार तीता ॥’

स्वामी के मन के भीतर
था जो कुछ विषाद,
दूर हो गया सत्वर
मेरी बातें सुनने के बाद ॥

पिता, माता, भ्राता, बन्धुवर
सेवक परिजन सबको त्याग कर
बने काननगामी
मुझे साथ ले प्रिय स्वामी ॥

मेरे एक देवर थे ‘लक्ष्मण’ नाम के,
बने वनवास-सहचर प्रियतम के ।
विस्मृति-सरिता के भीतर
समस्त राजसुख फेंककर,
वन-पर्वतों में घुमने लगे हम तीन
अपनाकर हर्ष नवीन ॥

पाकर सखियाँ नयी
मुनिकन्याओं को वनस्थल में,
मैं सानन्द डूब गयी
उन्हींके स्नेहसुख-जल में ॥

जीवन में स्फूर्तियाँ भर सरस
व्यतीत हुए हमारे कई दिवस,
पञ्चवटी कानन के भीतर
पुनीत गोदावरी के तट पर ॥

प्रत्यूष में बयार
ले वन-पुष्पों का सौरभ-सम्भार,
बहकर धीर-धीर
महका देती हमारा कुटीर ॥

वहाँ आकर पिक
बन राजवैतालिक
भर देता था कर्ण-कुहर
बरसा पञ्चम स्वर मनोहर ॥

नृत्यरत हो सबेरे
उल्लसित मयूर मयूरी
सब करते थे मेरे
आश्रम-आंगन की शोभा पूरी ॥

आते थे सकौतूहल
हरिण-शावक दल-दल
मेरे हाथों से नीवार
करने के लिये आहार ॥

त्याग माता का अंक
कलभ कलभी
खेला करते मेरे पास निःशंक
मेरे हाथों से आहार ले सभी ॥

नाना प्रकार सुमन ले
गूँथ सुमञ्जुल हार,
अर्पण करती मैं प्राणनाथ के गले
आन्तरिक प्रीत्युपहार ॥

मेरी वेणी में सजा प्रसून-आभरण
प्रिय कान्त कौतुक रच अन्तरंग,
करते थे पुष्प-वन भ्रमण
मुझे ले अपने संग ॥

कहते थे : ‘सखी ! तुम प्रियतमा
मेरी प्रीति की प्रतिमा,
संगिनी मेरे जीवन की,
स्वर्ग-सुख की गरिमा हो जानकी ॥’

तभी मैं कहती :
‘हे प्राणनाथ !
जो प्रेम-अधिकार आपका अपना,
नहीं की जा सकती
कभी उसके साथ
तुच्छ स्वर्ग-सुख की तुलना ॥’

एक दिन सुमनभरा चन्द्रातप सुन्दर,
पुष्पमय स्तम्भ सहित सादर
मैंने निर्माण कर सिंहासन,
कदम्ब-फूलों से सजाया सुशोभन ।
फूलोंभरा छत्रवर,
फूलों का रमणीय चामर,
पुष्प-पुञ्ज ले विचित्र व्यजन बना
केतकी-पंखुरियों से की मुकुट रचना ।
रत्न-रूप खचित कर कई सुमन मनोरम,
बोली मैं विनम्र-वदन :
‘मेरे प्रभो प्रियतम !
करूंगी श्रीचरणों का अर्चन,
कृपया इसे स्वीकार
सिंहासन पर विराजिये एक बार ॥’

महामना प्राणेश्वर
बोले मुस्कुराकर :
‘मना है प्रिये !
राजकीय उपचार मेरे लिये ।
आज सजाऊंगा सुन्दरी
तुम्हें वनफूलेश्वरी ॥’

ऐसा कहकर जोर पकड़ मेरे हाथ
सजाने लगे मुझे फूलों से प्राणनाथ ।
अपनी शपथ से बातें जोड़
मेरी आपत्तियाँ तोड़,
खड़े रहकर मेरे सामने
लगे मुझे निहारने ॥

मुद्रित हो गये मेरे नयन लज्जाधीन,
द्रवित रही मैं कुसुमासन पर समासीन ।
प्रियतम रसिक-शेखर
बोले वाणी प्रीतिभरी :
‘करो करुणा-कटाक्ष-पात सादर
अरी कुसुमेश्वरी !’ ॥

वहीं अवलोकन कर
उनका वदन आनन्द-दीप्यमान,
मैं बोली : ‘विवेकी-प्रवर !
हुआ नहीं यह समुचित विधान ।
प्रभु-चरण-पूजन हेतु
योग्य नहीं जो वस्तु,
वह कभी होती क्या
तुच्छ दासी की भोग्या ?’

वे बोले : ‘रही है सदा
रीति यह प्रणयी-प्रणयिनी की,
बढ़ाकर एक अन्य की मर्यादा
प्राप्त करते प्रीति आन्तरिकी ॥’

प्रियतम के मुख से सारी
सुनकर बातें प्यारी
धन्य समझ भाग्य अपना
मैं सहर्ष रही निर्वचना ॥

धीरे-धीरे आया सायं-समय,
गगन में हुआ कलाकर उदय ।
प्राणेश्वर लगे विहरने
कानन में मेरा हाथ ले ।
फिर मेरा स्वान्त रञ्जन करने
वनवास-सुख बयान करते चले ॥

अदूर में उसी समय
सुन चक्रवाक-स्वन,
सहसा प्राणेश्वर ने सप्रणय
चूम लिया मेरा लपन ॥

कौतुकवश मैंने प्रश्न किया,
‘कारण उसका है क्या ?’
उन्होंने जो कहा,
अब उसका स्मरण हो रहा ॥

वे बोले : ‘प्रिये !
चक्रवाक से कान्ता उसकी दूर रही ।
दुःखानल में इसलिये
दग्ध हो रहा विरही ।
संगिनी के संग-सुख में खूब
दिनभर वह रहता डूब ।
अभी जीवन अपना
तिक्त समझ रहा प्रिया के बिना ॥

यदि कानन-सहचरी
तुम न होतीं मेरी,
वेदना-दग्ध होता मैं इस पल
वन के भीतर भटकता विकल ।
कह रहा हूँ जो जो सुख वनवास में आते,
मेरे जीवन को सब शुष्क कर देते ॥

स्वभाव-विकल है जीवन प्रेमी का,
साथ जब होती नहीं प्रेमिका ।
व्याकुल जीवन भारी
व्यर्थ समझता दुनिया सारी ॥

जब जीव बहता
संसार-पारावार में आकर,
पार जाने का भरोसा रहता
वनिता-नैया के आश्रय पर ॥

अनुभव विरह दुःख का
मुझे तब था नहीं ।
सब सुन सलज्ज नम्र-मस्तका
मैंने हँस दिया वहीं ॥

हाय ! कुछ काल के अनन्तर
उस दारुण कष्ट ने
मेरे जीवन में अपने,
कर लिया अधिकार पूर्णरूप से आकर ॥

भुक्तभोगी करता अनुभव
दूसरों का दुःख वास्तव ।
आज चक्रवाक के विलाप ने
बहा दिये मेरे नयनों से आँसू घने ॥’

बोली तापसी : ‘अरी सहेली !
बात निश्चित मैंने समझ ली ।
तुम्हारे प्रियतम का हृदय महान्
अपार प्रेमामृत-निधान ॥

चक्रवाक समान महाराजा वे
रोते होंगे आँसू बहा आँखों से अपनी ।
अविलम्ब ही बीत जावे
तुम्हारी विपदा की रजनी ॥

उजड़ गया है तुम्हारा
संसार सुनहरा ।
हुआ क्यों इस प्रकार
दारुण दुर्विचार ?
जिसे नरेश्वर ने
संपत्ति मानी थी जीवन की,
उसे त्याग करने
कैसे इच्छा हुई उनकी ?

विधि का है जो विचार,
उसे बारबार धिक्‌कार ।
कहीं क्या कर डाला,
ला गरल अमृत के ऊपर डाला ॥’

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(तपस्विनी काव्य का षष्ठ सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
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Friday, August 26, 2011

Tapasvini Kavya Canto-7 (‘तपस्विनी’ काव्य सप्तम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)
Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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[Canto-7 has been taken from pages 121-146 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya'
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-7]
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तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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सप्तम सर्ग
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‘अरी सखी !’, बोलीं वैदेही,
‘मेरे दुःखों का कारण मेरा दुर्विपाक ही ।
मेरे कर्मों के लिये विधि का
दोष नहीं किसी प्रकार का ।
स्वभाव से मेरे स्वामी महीयान्
अपार कृपा-निधान ॥

प्रियतम से बिछड़ रह सकता जीवन अपना,
मन में एक पल भी न थी ऐसी कल्पना ।
घोर दुर्विषह दुःख मैंने झेले कितने
केवल स्वामी के पावन मुख दर्शन करने ॥

समाकर मेरे श्रवण-विवर
आशा उसी समय
सान्त्वना-मन्त्र बनकर
हर लेती मेरी मुमूर्षा को निश्चय ।
अभी मृत्यु हो चुकी
उसी आशा की ।
स्मृति में उसे लाकर मेरे प्राण
हो रहे दग्ध म्रियमाण ॥’

बोली सहचरी :
‘सखी जानकी !
आशा कैसी थी, क्यों मरी,
मैं समझ न सकी ।
तुम-जैसी साधवी सुमती
झेल दारुण दुःखाघात
न विधि की निन्दा करती,
यही तो विचित्र बात ॥’

सती बोलीं : “ सहचरी !
सुनकर मेरी कहानी दुःखभरी
हो जायेगी ज्ञात
तुम्हें सारी बात ।
मैंने किया जैसे
घोर दुःखों का आमन्त्रण,
फिर आया जैसे
मेरी आशा का मरण ॥

पञ्चवटी में कुटीर के निकट एकदिन
विचरने लगा सानन्द एक स्वर्णिम हरिन ।
चित्रित अंग उसका चिक्‌कण सुन्दर
चमकने लगा भानु-रश्मि का संग पाकर ॥

थी उसके स्वर्णिम अपघन में
जो चित्र-बिन्दुओं की कान्ति मनोरम,
उसने मेरे नयन में
जगाया रत्नों का भ्रम ॥

पहले कभी उस-जैसा मृगवर
हुआ नहीं था मेरा लोचन-गोचर
अपने राजभवन में,
नगर में या कानन में ॥

सोचा मैंने,
‘जब नगर लौट चलूंगी,
तब साथ अपने
उस मनोहर हरिण को ले लूंगी ।
विस्मित करा दूंगी
नगरवासियों का मन,
संग-संग करूंगी
कानन-सौन्दर्य-राशि वर्णन ॥’

मैंने उसे पकड़ने आहार दिखलाया,
परन्तु वह चौंककर समीप न आया ।
लुभाकर मेरा मन,
रमाकर मेरे नयन
बारबार जाकर
घुस गया कानन के भीतर ॥

उसीके कारण
जब मेरा अन्तःकरण
व्यग्र हो उठा अत्यन्त,
मेरे प्राणेश्वर
सस्नेह बोले तुरन्त :
‘पूरी करूंगा, अरी प्यारी !
उत्सुकता तुम्हारी
उस रमणीय हरिण को लाकर सत्वर ॥’

मृग के पीछे-पीछे रघुवीर
चले तुरन्त ले हाथ में धनुष तीर ।
उसे अनुसरण कर अति शीघ्र चल
मेरी दृष्टि-सीमा से हो गये ओझल ॥

हुई कानन के भीतर
‘रक्षा करो लक्ष्मण’ ध्वनि श्रुतिगोचर ।
उस पुकार से हो गया विकल
मानस मेरा उसी क्षण ।
उधर मन संग दिया श्रवण-युगल ।
‘रक्षा करो लक्ष्मण’
वही पुकार
गूँज उठी पुनर्बार ॥

समीप मेरे थे देवर
लक्ष्मण वीरवर ।
कहा अधीर-मन मैंने :
‘देखो वत्स ! संकट आया ।’
मेरे मन में आश्वासना देने
उन्होंने समझाया :
‘भय न करना, देवी !
वह भाषा नहीं राघवी ॥’

अरी सखी ! वीर का स्वभाव सही
समझते वीर पुरुष ही ।
देखा मैंने उसी क्षण
धीर गम्भीर खड़े हैं लक्ष्मण ॥

नारी का हृदय
दुर्बल है स्वाभाविक ।
उनके वचन से मैं उसी समय
होने लगी विकल अधिक ॥

बिनती के अनन्तर
कटु वचन कहकर
उन्हें प्रेषित किया मैंने
शीघ्र स्वामी के समीप चलने ।
मेरी सुख-सौभाग्य-सम्पदा सभी
बह गयी उनके प्रस्थान की धारा में तभी ॥

विपत्ति वहाँ शरीराकार
योगीन्द्र-वेश भिक्षुक बनी मेरे द्वार ।
स्वामी के प्रत्यावर्त्तन तक उधर
न करके प्रतीक्षा,
अड़ा रहा वह अधम पामर
पाने अपनी भिक्षा ॥

भिक्षादान के समय बलपूर्वक उसने
मेरा हाथ पकड़ सत्वर
बिठाया मुझे विमान में लेकर ।
मैंने विनय किये कितने,
तर्जनाएँ दीं कितनी,
परन्तु दुष्ट ने कुछ न सुनी ॥

जाना मैंने उसी क्षण,
वेश नहीं गुण का लक्षण ।
साधुवेश बाह्य आकार,
परन्तु आभ्यन्तर अन्यप्रकार ।
लोग मानते धर्म सर्व-मंगलकारी,
कौन जाने, यम है धर्म-नामधारी ॥

दक्षिण दिशा की ओर
दुष्ट ने चलाया विमान,
घनघोष से हो उठा जोर
व्योम-मार्ग कम्पमान ।
मैंने जितने भी उच्च स्वर
किये क्रन्दन दीन,
घोर घर्घर रथ-नाद के अन्दर
सब हो गये विलीन ॥

देखा मैंने निम्न की ओर,
मुझे निहार रो रहे थे वन में कई मोर ।
दल-दल मृग उधर
मस्तक उठाकर
रहे थे रथ निहार
त्रस्त नयनों में बारबार ॥

मार्ग रोक युद्ध किया एक पंछी ने,
परन्तु दुष्ट ने उसके पंख छीने ।
लेकर प्रतिकूल प्रवाह
रोक न सका समीर दुष्ट की राह ॥

मार्ग के ऊँचे पर्वत
शीश उठाकर समस्त
वहाँ रोक न सके
उस विमान को विहायस के ।
मर्त्त्यवासियों को देने के लिये वार्त्ता
नीचे देख रही मैं दीन-नयना आर्त्ता ॥

रथ-घोष में मेरी पुकार सकल
हो जायगी निष्फल,
मानस में मैंने यही विचार
नीचे गिरा दिये सब अलंकार ।
देखा मैंने, व्याकुल सरिताएँ उस पल
शीर्ण-काया में जैसे हो गयीं निश्चल ॥

संकुचित-कलेवर
ऊँचे-ऊँचे वृक्ष सारे
सिमट गये परस्पर
उस पामर के भय के मारे ।
धरती धीरे-धीरे हो गयी चुप,
हरिण विहंगम सभी गये छुप ॥

दृश्य हुईं धीरे घनी नीलिमाभरी तब
तीन दिशाएँ पश्चिम, दक्षिण और पूरब ।
धरा-लक्षण कुछ भी न हुआ दृश्यमान,
उसके भीतर दुष्ट ने चलाया विमान ॥

आगे दृश्य हुई दिशा की छोर उजली,
मैंने धीरे-धीरे उसे वनाग्नि-शिखा समझ ली ।
रथ चला जितना समीपतर
अनगिन आलोक-पुञ्ज जगमगाये उधर ॥

सोचा मैंने : ‘ताराएँ छोड़कर व्योमस्थल
झुण्ड बना दिवस में चमक रहीं समुज्ज्वल ।
चन्द्रमा के विरह से गगन-मण्डल त्याग
जला रहीं हृदय में विरह की आग ।
या मर्त्त्यलीला समाप्त हो गयी मेरी,
प्रवेश कर रही हूँ यमराज की नगरी ॥’

देखा मैंने, मनोरम सौधावली
काञ्चन-कलसों से सुशोभित उजली ।
धीरे-धीरे उस नगरी में विशाल मनोहर
भवन-वीथियाँ हुईं दृष्टिगोचर ।
दिनकर ने उसी नगरी को है सजाया,
अपने करों से भवनों के मस्तक पर
कलसों को रञ्जित कर
है दीप्तिमान् बनाया ॥

विचार आया मेरे मन में उसी समय,
वह योगी यमदूत है निश्चय ।
मैं सदर्प दृढ़-मन
प्रवेश करूंगी यम-दरवार,
उठाकर अपनी तेजधार-सम्पन्न
दीप्तिभरी पतिभक्ति-तलवार ॥

नगर-प्रान्त में योगी रथ से उतर
एक उद्यान का मार्ग निहार हुआ अग्रसर ।
मनोरम संगमर्मरों से बनी
वही राह थी सुहावनी ।
विविध पुष्प-फलों से उद्यान
था अत्यन्त शोभायमान ॥

वहाँ अधिकतर अशोक पादपकुल
पुष्प-पुञ्जों से दीखते सुमञ्जुल ।
उद्यान-मध्य में एक समुज्ज्वल भवन
नाना रत्नों से था नेत्र-रञ्जन ॥

योगी मुझे बोला : ‘ वहाँ करो अवस्थान,
मन में प्रियतम के बिना
विरह मत करो गिना ।
हो गया अवसान
तुम्हारे वनवास-दुःखों का ।
सारे स्वर्ग-सुखों का
भोग करो ऐश्वर्य
इस देश में भर अपूर्व सौन्दर्य ॥

त्रिलोक में जो द्रव्य-लाभ दुष्कर,
अब तुम्हारे चाहने पर
सब कुछ अनायास
सुलभ हो जायेंगे पास ।
सहस्र सुन्दरियाँ प्यार दरशाकर
दासी बनेंगी तुम्हारे कमल-पैरों में आकर ॥’

बुलाकर सहस्र रमणियाँ रत्नभूषा-मनोरमा,
उन्हें दृढ़ समझाकर बोला योगी,
‘इसे जानकर मेरी हृदयेश्वरी प्रियतमा
तुम सब सभक्तिक सेवा करती रहोगी ॥

पास नित्य सेवा करोगी
उसके मानस अनुसार सर्वथा
और सुनाती रहोगी
मेरे प्रतापों की गाथा ।
मेरे विपुल वैभव में जैसे
रम जाये उसका अन्तःकरण,
यत्न करती रहोगी वैसे
तुम सब प्रतिक्षण ॥’

अदृश्य हो गया योगी कहकर इतना,
विस्मय से भरा मेरा हृदय अपना ।
वह योगी कौन भला ?
मुझे कहाँ ले आया ?
उसका नगर क्या ?
मुझे कुछ पता न चला ॥

बन गयी मैं कैसी
योगी की हृदयेश्वरी प्रेयसी ?
तनु धारण कर राघव-पत्नी की
अभी जीवित हूँ जानकी ॥

मेरा तो हुआ नहीं निधन,
अब मुझे है स्मरण,
श्रीरामचन्द्र कौशल्या-नन्दन
मेरी एकमात्र शरण ॥

हृदय में फिर दृढ़ निश्चय किया,
जो कोई हो योगी, इससे भय क्या ?
जीवन में जब तक रहे स्मरण,
कौशल्या-नन्दन ही मेरी शरण ॥

चाहे हो यह यम-नगर या स्वर्गस्थल,
विहरते होंगे यहाँ देव सकल,
कौन हर सकेगा मेरा मन ?
मेरी शरण केवल कौशल्या-नन्दन ॥

सहस्र सेविकाओं का मुझे प्रयोजन क्या ?
और मेरा अवगाहन या भोजन क्या ?
करते होंगे भ्रमण
कानन में मेरे प्राणेश्वर,
निविष्ट रहेगा मेरा अन्तःकरण
उनके श्रीचरणों में ही निरन्तर ॥

सुन्दर वीणाहस्ता शत सरस्वतियाँ आयें
और मेरे समीप संगीत सुनायें,
मेरी श्रुति में कहाँ हो पाएगा उसका मूल्य
प्रिय-मुख से निःसृत एक पद तुल्य ?

इसप्रकार करके अनेक भावना
प्रिय-चरणों में लगाकर ध्यान
खो दिया मैंने जीवन का ज्ञान ।
किस प्रकार कितना काल बीता,
अन्य कुछ न जाना
बिना पति-चिन्ता ॥

परन्तु उस राज्य में दिन और रात
मुझे देव-समय सम हुए प्रतिभात ।
माना मैंने उसे देवभुवन,
देव-साहस से भर लिया जीवन ॥

ईश्वर से प्रार्थना मैंने की
देव-शक्ति पाने की,
देवी-हृदय की समुचित
पति-भक्ति सहित ।
आशा रही पाने पति-चरण-सुधा,
बिसर गई मैं सारी पिपासा, सारी क्षुधा ॥

दासियाँ लाकर नाना अंगराग सिंगार
विविध अलंकार,
विविध आहार,
चाटुवाणी बोलीं अनेक प्रकार ।
परन्तु मेरा अन्तःकरण वहीं
कभी आकर्षित हुआ नहीं ॥

दासियों के कथालाप से
धीरे-धीरे मैं जान गयी,
अपने अमित प्रताप से
रावण वह त्रिलोक-जयी ।
सुनकर उसका नाम
देवराज इन्द्र को भी लगती शंका ।
है उसका धाम
पारावार-परिखायुत लंका ॥

उस राज्य को मैं सीता
हो चुकी हूँ आनीता ।
छद्म योगीवेश करके धारण
हर लाया है दुष्ट रावण ॥

उसके भवन नगर
सब अनुपम सुन्दर,
नर-किन्नरों का प्रवेश उधर
अत्यन्त दुष्कर ॥

जहाँ उसका मन लगता,
कार्य सिद्ध करते भय से सभी देवता ।
उसके नयनों में रक्तिमा आने पर
ब्रह्मा के चित्त में जागता विपत्ति का डर ॥

श्रवण करके नाम रावण राक्षस का,
मैं जान गयी उसे,
चूर्ण हुआ था गर्व जिसका
माहेश्वर-धनु से ।
सोचा मैंने, कितना साहस किया है श्वान ने
यज्ञ-पीयूष पान करने ॥

सचमुच एकदिन अग्नितेज लेकर
खड़ा हो गया मेरे समीप वह पामर ।
पापभरे वचन में,
पापभरे मन में,
सुनाकर आत्मगौरव अपना
पापी बकता रहा कितना ॥

देख मेरी दुःख-घनघटा की अश्रुधार
हट गया वह ले अहंकार-अन्धकार ।
मेरी उस घटा के भीतर अचानक
भयंकरी आशा-विद्युत की
छटा गयी चमक
उस दुष्ट धूर्त्त की ॥

सखी ! जिस दिन से मुझे ज्ञात हुआ,
पापी दानव ने है मेरा हाथ छुआ,
तब स्पर्श-स्थान से उठकर
फैल सारे कलेवर
असहनीय जलन
अस्थिर कर रही मेरा जीवन ॥

शरीर के सारे रोम हुए मुझे भान
विष-लिप्त वाणों के समान ।
व्याध-तीरों से आहता
मृगियाँ कोमलांगी
कैसा दुःख सहती होंगी,
मेरा मन सोचता ॥

दुःसह दुःख हृदय में झेलकर
चित्त दृढ़ लगाया मैंने धर्म पर ।
भरोसा रहा मेरा अटल,
सर्वदा धर्म ही अबला का बल ॥

अज्ञानवश मैंने भिक्षा दी थी एकबार
अधम राक्षस को हस्त पसार ।
यदि वह पापी इस पल
प्रदर्शन करेगा अपना बल,
मार डालूंगी उसे
या मरूंगी उसके बाहु से ॥

यदि दुनिया में सत्य है धर्म
देखेगी दुनिया मेरा अद्भुत कर्म ।
पाप-कार्पास हो भी पर्वत समान,
उसे भस्म करता पुण्य-वह्निकण शक्तिमान् ॥

देखो सजनी ! धर्म ने सत्य बन
मेरे प्राणों में किया अमृत-सा सिञ्चन ।
आकर कोई कपिवर
दे गया मुझे स्वामी की खबर,
रचा उसके बाद
रावण के विरुद्ध विवाद ॥

रघुवर ने वानर-बल संग ले तुरन्त
सिन्धु-नीर में सेतुबन्ध निर्माण करके,
लांघ दुस्तर विस्तारित जल
किया लंकापुरी पर प्रबल
आक्रमण दुरन्त,
शंका भर दी प्राणों में दानवेश्वर के ॥

आरंभ किया दुष्कर
याग संग्राम का,
वानरों का गर्जन सुनकर
शंकित हो उठी लंका ।
राक्षस-कुल में बली थे जितने,
आकर सब उस याग में बलि बने ॥

धर्म-मार्ग पर केवल एक था
राघव-चरणों की शरण में सर्वथा ।
अभय सुमन-माल्य कण्ठ पर धारण कर
अटल यूप बना महायज्ञ में उधर ॥

बह गये थे मेरे जितने लोतक,
उनके कोटि-गुणों तक
वहाँ बह गये फिर
राक्षसगण के रुधिर ।
लंकानगरी का अधीश्वर
पाकर अतिशय शंका,
शोक-समुद्र में बहकर
ग्रास बना प्रभु के शर-ग्राह का ॥

बोले मुझे बुलाकर तदुपरान्त
निहार स्नेह-हीन नयनों से मेरे प्रियकान्त,
‘कुसंग से बढ़कर नहीं होता
संसार में कोई पातक ।
कुसंगी के संग से मिलता
सन्ताप अत्यन्त हानिकारक ॥

तुम थीं मदनान्ध दानव के पाप-भवन में;
तुम्हारे चित्त में जागी होगी पाप-वासना,
यही है संभावना ।
इसलिये तुम्हें पुनर्बार
मैं कर नहीं सकता स्वीकार,
स्वीकारने से होगी लोक-निन्दा हमें ॥

जब जलद का जल निम्न-गति करता,
बादल उसे क्या फिर रख सकता ?
अग्निशिखा समान अग्नि में दग्ध हो वही जल
बादल से मिल पाता फिर ऊपर को चल ॥’

सोचा मैंने : ‘किया था अपना जीवन धारण
केवल सेवा करने प्रभु के कमल-चरण ।
चरण-स्पर्श करने मैं यदि नहीं योग्या
मुझे जीवन की और आवश्यकता क्या ?

निहार-निहार प्रभु का वदन
जला दूंगी अपना कलेवर,
मेरा सुख-अर्जन
क्या हो सकता इससे बढ़कर ?
तनु भस्म होने पर मेरे प्राण निश्चय
प्रभु के श्रीअंग में प्राप्त करेंगे आश्रय ।
धर्म-बल से यदि बचेगा शरीर किसी प्रकार
प्राप्त करूंगी प्रभु का द्विगुण प्यार ॥’

बोली मैं तदनन्तर,
‘प्रज्वलित किया जाये वैश्वानर ।
उस में अवगाहन करने
यह दासी प्रस्तुत है सामने ॥’

अकुण्ठ-आज्ञाकारी लक्ष्मण ने सकुण्ठ-मन
कर दिया सत्वर अनल-प्रज्वलन ।
धधक उठीं अग्नि-शिखाएँ वायु-वेग से प्रलम्ब,
व्यग्र हुईं उछलने अम्बर में अविलम्ब ॥

डालकर नयन प्यासे
प्रभु के मुखारविन्द पर,
अग्नि-समीप चल हृदय-बल से
मैं कहने लगी उधर :
‘हे सूर्य ! चन्द्र ! अनिल ! अनल ! विहायस !
तुम सब जानते हो प्राणियों का मानस ।
राघव के बिना अन्य व्यक्ति में यदि किंचित्
हुआ होगा मन मेरा प्रणय से आकर्षित,
तुम तो सर्वभक्षण-दक्ष हो अनल !
मुझे भस्म कर दो इसी पल ॥

रावण की नगरी के अन्दर
रही थी मैं बन्दिनी बनकर ।
मुझे यदि उलझाया होगा उसने
पाप आचरण करने,
तब प्रभु के चरण-पंकज पावन,
कोटि जन्मों तक
नहीं कर पाऊंगी दर्शन,
मुझे भस्म कर दो, हे पावक ! ॥

कौन पापी, कौन पुण्यवान्,
तुम्हें नहीं पहचान ।
अपने धर्म के कारण
करते हो सबके प्राण हरण ।
यदि धर्म विश्व में शाश्वत सत्य विदित,
मेरा धर्म मुझे अपवाद से बचाएगा निश्चित ॥

हे धर्म ! मेरे तन में
अपने गुणों के साथ निवास करो ।
मेरे संग ज्वलन में
समा जाओ, मत डरो ।
जीवन में न कर सकोगे
तो मेरी मृत्यु के बाद,
मुझे दासी बना दोगे
सेवा करने प्रभु के पाद ॥

राख तो होगा मेरा तन जलने के बाद,
उसे करवादोगे किसी तरु की खाद ।
बर्धकी के हाथों काष्ठ देकर उस तरु का
मुझे बनवादोगे प्रभु की युगल पादुका ॥’

उधर बारबार
प्रभु का श्रीमुख निहार
अनल में जाकर
समा गयी मैं निडर ।
देख यही गति
रोए रघुपति ।
रोए लक्ष्मण भी,
करुण स्वन में सैनिक सभी ॥

अनगिन नयनों में अश्रुजल
उछल गया प्रबल ।
मैं कारुण्य-नीर में हो गयी मगन ।
वहाँ मुझे अनल
अनुभूत हुआ सुशीतल,
हाहाकार से व्याप्त हुआ सारा गगन ॥

हुआ मेरा अनुकूल आकाश-वचन,
जान सके प्रभु मेरा सतीपन ।
धर्मवश बुझ गया वैश्वानर,
धर्म-बल से बचे मेरे प्राण उधर ॥

मेरे दुःख समस्त हो गये भस्मसात्,
प्रभु-पद की दासी बनी मैं सौभाग्य-वशात् ।
सोचा मैंने : ‘कष्ट से कितने
था जीवन बचाया,
इसी कारण ही अपने
प्रभु का चरण-कमल पाया ॥’

दिव्य रथ में मुझे बिठाकर
साथ ले असंख्य राक्षस वानर
अयोध्या-नगरी की ओर
विजयोल्लास-सुख में विभोर,
लौट चले प्रभु रघुवर
विहायस-मार्ग पर ॥

मैंने विरह-मरुप्रदेश करके पार
शुष्क प्राणों में पाया प्यार का पारावार ।
प्राणों में हुआ अपूर्व सुख का सञ्चार,
मैंने आनन्दमय माना संसार ॥

अपने जीवन में यदि छा गया है दुःख,
सारे विश्व में दिखाई पड़ता नहीं सुख ।
जब होता अपने जीवन में सुखोदय,
सारा संसार दीखता सुखमय ॥

जिस रथ पर गिर
पड़ी थी मैं विपत्ति-कूप में,
उसी रथ पर फिर
चढ़ गई सम्पत्ति-स्तूप में ।
जिसे देख-देख थी मैं रोदन-विकला,
उसे देख-देख आनन्द बढ़ता चला ॥

विचित्र गति से चल
रहा था रथ रत्न-समुज्ज्वल ।
नीचे अथाह सागर,
ऊपर बलाहक,
समस्त सरिता पादप भूधर
हुए मेरे नयनों के अपार हर्षदायक ॥

पूर्व निवास सभी वनस्थल,
विहार-निकुञ्ज-पुञ्ज, मनोरम सानुमान्,
धूम-जटिल ऋषि-आश्रम सकल
मेरे अन्तःकरण को कर रहे थे आह्वान ॥

व्यस्त-केशा मुनिकुमारियाँ
रथ का घर्घर स्वर
दूर से सुन चकित-अन्तर,
वदन उठाकर रही थीं निहार
मेरे मन में करके वहाँ
विगत सुखों की स्मृति सञ्चार ॥

उनके प्यार पावन,
सानन्द आदर अपार,
कोमल मधुर वचनों से सुन्दर अधर,
ममताभरी शान्त भोली चितवन,
सब बरसाने लगे अमृत की धार
मेरी स्मृति की भूमि पर ॥

क्रमानुसार कुमारियों के सारे नाम
निर्मल बने अरविन्द रूप अभिराम
वहाँ विकसित होकर,
घोर विरह-निशान्धकार के अनन्तर
सुख-प्रभात के आगमन पर
मेरे मानस-सरोवर के भीतर ॥

उनके सारे पिछले भाव-सौरभ ने मन्द-मन्द
मेरे प्राणों में भर दिया अनन्त आनन्द ।
करके कानन दर्शन
तृप्त नहीं हुआ था मेरा मन,
हुआ स्यन्दन उधर
तीव्र वेग से अग्रसर ॥

नैसर्गिक शोभा-भवन मनोरम बन का
परिहार मन मेरा कर न सका ।
फिर मगन था गगन में, स्यन्दन में
वह मन अपना,
लगा उधर अयोध्या-भुवन में
करने श्वश्रू-पद वन्दना ॥

श्याम-सुन्दर कान्तिमान् कान्त को साथ लेकर
त्रिस्थल के सुहाने रंगों में विहर
हुआ मेरा मन अर्धमण्डलाकार शोभायमान
अभिनव जलद में इन्द्रधनुष के समान ॥

प्राण-प्रतिम पुत्र के वन-प्रस्थान अनन्तर
मेरे श्वशुर अयोध्या-अधीश्वर
बुझाकर अपना जीवन-दीपक दुःखित-मन
चले गये इन्द्र के पास स्वर्गभुवन ॥

देखकर राज्य अराजक
कानन पहुँचे भरत देवर
स्वामी के पास सत्वर,
बोले कृताञ्जलि-पूर्वक
दुःखित-मन सविनय ।
चित्रकूट में थे हम उसी समय ॥

बहुत बिनती कर वीर भरत ने
स्वामी से कहा महीपति बनने ।
पितृभक्ति और भी करके दृढ़तर
सम्मत न हुए राघव उन बातों पर ॥

बोले : ‘ पिताजी ने अपना शरीर त्याग दिया,
परन्तु सत्य भंग नहीं किया ।
पितृ-पालित उस धर्म-विहंग का गला
कैसे घोंट दूंगा अविवेक होकर भला ?’

स्वामी-चरणों में गिर
भरत ने रो रोकर कहा फिर,
‘भ्रात ! अपने पास
मुझे बना लीजिये चरणों का दास ।
अस्ताचल चलते तपन
जब छोड़कर धरती,
उन्हें उनकी किरन
क्या त्याग सकती ?’

प्रभु बोले : ‘रजनी में वितर प्रकाश प्यारा
मिटाते चन्द्रमा धरती का दुःख सारा ।’
भरत ने उत्तर दिया करके बिनती :
‘प्रभो ! सूर्य की प्रभा चन्द्रमा को मिलती ।
आपकी रत्न-पादुका लेकर व्रती
सम्हाल सकेगा मेरा शीश,
धारण करते धरती
जैसे शेष फणीश ।
मेरे सिर पर जब पादुकामणि भाती रहेगी,
बैरी-दुनिया मुझे भुजंग समझेगी ॥’

किया पादुका-युगल अर्पण
प्रभु ने भरत के हाथों उसी क्षण,
मस्तक पर उसे स्थापन किया भरत ने ।
अश्रुल-नयन लौट वे वीरवर
तत्पर हो गये तदनन्तर
राजलक्ष्मी का दुःख हरने ॥

चौदह वर्षों का जब हुआ अवसान
वे निहार रहे थे पन्थ ।
पहुँच गया विमान,
वहीं से अवतरण कर तुरन्त
मैंने सादर ग्रहण कर ली
श्वश्रुओं की चरण-धूली ॥

पाकर सानुज सपत्नीक प्रभु के दर्शन
भरत ने आनन्द-नद में डुबाया मन ।
चरणों में प्रत्यर्पित की युगल पादुका,
छत्र-चामर से पूजन किया प्रभु का ॥

मेरे स्वामी राजा बने,
मैं बनी राज्ञी उनकी ।
प्रभु-मानस-अनुकूल मैंने
श्रीचरणों में सेवा की ।
अभिलाषा जो मेरे मानस में आती,
शीघ्र वह सम्पादित हो जाती ॥

राजदम्पति हम प्रीति-नौका में बैठकर
सुख-सिन्धु में लगे रमने ।
सम्पदा-ऊर्मियों में कई संवत्सर
सकौतुक डुबा दिये हमने ॥

जाना था किसने,
मेरे ललाट पर
लिखे हैं दैव ने
अनगिन दुःखों के अक्षर ?
विपत्ति-रूप बड़वानल उपज भयानक
समस्त ध्वस्त कर देगा अचानक ?

दिवस-कान्ति-शेष से प्रतीयमान
रंगीन गगन के समान
भाग्यावसान के समय
हुआ मेरा गर्भोदय ।
दोहद-पूर्त्ति के लिये प्राणेश्वर
तत्पर हो गये अत्यन्त स्नेहभर ॥

‘करना चाहती मैं वन-विहार
वन-बान्धवी के संग, प्राणनाथ !’
एक दिन प्रियतम के पास इस प्रकार
अभिलाषा अपनी
व्यक्त की मैंने ।
उसी रात सजनी !
प्रभात के पूर्व ही स्वामी ने
भेज दिया मुझे लक्ष्मण के साथ ॥

लक्ष्मण ने गंगा-तट पर
मुझे पहुँचाया
और नौका से अवतरण कर
धीरे से जो बताया ...”
कहकर इस प्रकार
कण्ठ सती का रुद्ध हो गया ।
आगे दारुण दुःख निहार
रोने लगीं वैदेह-तनया ॥

अविरल अश्रुधार में बहती हुई इन्हें
शीघ्र थाम लिया मुनिकुमारी ने,
और मिलाकर वदन से वदन
किया करुण क्रन्दन ।
तापसियाँ उसे करके श्रवण
दौड़ चली आईं उसी क्षण ॥

दोनों को संग अपने
तुरन्त कुटीर में लाकर
लगीं इधर-उधर की कई बातें कहने
उनका मानस बहलाकर ।
वृक्षों में नीर-सिञ्चन,
कुसुमराशि-चयन
आदि कई बातें करते-करते तभी
निद्रा की गोद में मग्न हो गयीं सभी ॥

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(तपस्विनी काव्य का सप्तम सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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Thursday, August 25, 2011

Complete Hindi ‘Tapasvini’ Kavya (सम्पूर्ण हिन्दी ‘तपस्विनी’ काव्य : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर)

Original Oriya Mahakavya ‘TAPASVINI’   
written by Poet Gangadhara Meher (1862-1924)

Complete Translations 
into Hindi, English and Sanskrit languages
By : Dr. Harekrishna Meher.


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Tapasvinī, an eleven-canto Oriya epic poem, is the magnum opus of Poet Gangadhara Meher. With the prevailing sentiment of Pathos, this kāvya depicts the post-banishment episode of Sītā in the hermitage of Sage Vālmīki. Here Sītā, the adorable daughter of Earth and the devoted wife of King Rāma, in her later life appears as a Tapasvinī, ‘A Woman practicing penance’ or ‘An Ascetic-maid’. In this Rāmāyana-based literary composition, the poetic presentation is well-embellished with originality and significant innovations. Like Kālidāsa in Sanskrit and William Wordsworth in English, Gańgādhara Meher is regarded as ‘Prakŗti-Kavi’, Poet of Nature, in Oriya literature.
This epic poem reveals the ambition of the poet to portray the brilliant character of a devoted wife steeped in Indian culture. With vivid and prominent delineation of Sītā’s life-deeds, 'Tapasvinī Kāvya' may be construed as a ‘Sītāyana’ in the field of Indian Literature.

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Complete Hindi ‘TAPASVINI’ is presented here.

Hindi Translation Book ‘Tapasvini’ 
By : Dr. Harekrishna Meher.

Published by :
Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.


* [All Eleven Cantos have been taken here from this Hindi Book.]

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Hindi Tapasvini  [Contents]
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)   


सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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ग्रन्थ-सूची  

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प्राक्‌कथन :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-praak-kathan.html
*
तपस्विनी : एक परिचय :

http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html
http://tapasvini-kavya.blogspot.com/2011/09/tapasvini-ek-parichaya-drharekrishna.html
*
मुखबन्ध :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-preface.html
*
प्रथम सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-1.html
*
द्वितीय सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-2.html
*
तृतीय सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-3.html
*
चतुर्थ सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-4.html
*
पञ्चम सर्ग :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-5.html
*
षष्ठ सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-6.html
*
सप्तम सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-7.html
*
अष्टम सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-8.html
*
नवम सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-9.html
*
दशम सर्ग :

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/tapasvini-kavya-canto-10.html
*
एकादश सर्ग :
http://hkmeher.blogspot.com/2011/09/tapasvini-kavya-canto-11.html

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** सम्पूर्ण ** 
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
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For Articles on My Hindi-English-Sanskrit Translations of Tapasvini Kavya,
please see : 

http://hkmeher.blogspot.com/2011/08/my-hindi-english-sanskrit-articles-on.html   
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Sunday, August 21, 2011

Tapasvini Kavya Canto-4 (‘तपस्विनी’ काव्य चतुर्थ सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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[Canto-4 has been taken from pages 78-89 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ' Tapasvini : Ek Parichaya'
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-4]
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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चतुर्थ सर्ग
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समंगल आई सुन्दरी
प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा,
हृदय में ले गहरी
जानकी-दर्शन की तृषा ।
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में,
सती-कुटीर के बाहर
आंगन में खड़ी होकर
बोली कोकिल-स्वर में :
‘दर्शन दो, सती अरी !
बीती विभावरी ॥’ (१)

अरुणिमा कषाय परिधान,
सुमनों की चमकीली मुस्कान
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :
आकर कोई योगेश्वरी
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी
सारा दुःख मिटाने पास
कर रही हैं आह्वान ।
मानो स्वर्ग से उतर
पधारी हैं धरती पर
करने नया जीवन प्रदान ॥ (२)

गाने लगी बयार
संगीत तैयार ।
वीणा बजाई भ्रमर ने,
सौरभ लगा नृत्य करने
उषा का निदेश मान ।
कुम्भाट भाट हो करने लगा स्तुति गान ।
[1]
कलिंग आया पट्टमागध बन, [2]
बोला बिखरा ललित मधुर स्वन :
‘उठो सती-राज्याधीश्वरि !
बीती विभावरी ॥’ (३)

मुनिजनों के वदन से
उच्चरित वेदस्वन से
हो गया व्याप्त श्यामल वनस्थल ।
पार कर व्योम-मण्डल
ऊपर गूँज उठा उदात्त ओंकार ।
मानो सरस्वती की वीणा-झंकार
विष्णु के मन में भर सन्तोष अत्यन्त
पहुँच गयी अनन्त की श्रुति पर्यन्त ।
धीरे-धीरे जगमगा उठा कानन सारा,
जैसे बल बढ़ने लगा मन्त्र द्वारा ॥ (४)

इसी समय सीता के समीप आकर
कहा मञ्जुल मन्द्रस्वर
ब्रह्मचारिणी अनुकम्पा ने :
‘उठो वत्से विदेह-कुमारी !
पधारी है उषा सुकुमारी ।
देकर अपने दर्शन
प्रसन्न करा ले उसका मन
विधि के अनुसार ।
तमसा राह निहार रही सुख पाने
तुझे गोद में बिठा एक बार ॥’ (५)

पद्मिनी-हृदय-गत शिशिर-बूँद में विद्यमान
खरांशु दिनकर के प्रतिबिम्ब समान,
अपने शोक-जर्जर
मानस-फलक पर
वीर राम का आलेख्य करके अंकन
आसन से खड़ी हो गयीं सती-रतन ।
नमन कर अनुकम्पा के पदद्वय,
उषा-चरणों में वन्दना की सविनय ॥ (६)

करके उसकी प्रशंसा रचना
बोलीं सती जानकी :
‘उषादेवी ! दुनिया में प्रदान करती हो सूचना
अन्धकार-ध्वंसी अंशुमान् के आगमन की ।
ज्योतिष्मान् हैं तुम्हारे मृदुल चरण,
उनमें अटल आशा ले जाती हूँ शरण ।
शुभ्र-सौरभ-रसिके अरी !
रघुवंशी पर बनो शुभंकरी ॥’ (७)

तमसा आश्रम-धात्री
पवित्र-स्रोता सुविमल-गात्री,
निशावसान में समुत्सुक-मन
बिछा आंगन में सुमन,
सींच बिन्दु-बिन्दु सुगन्धित उदक,
जला प्रभाती तारा मंगल दीपक,
मीन-नयनों में बारबार
चञ्चल निहार
सती सीता के शुभागमन की सादर
प्रतीक्षा कर रही थी उधर ॥ (८)

तापस-कन्याओं के आदर-वन्या-प्लावन से
विश्व-धन्या सती-शिरोमणि जानकी
सत्वर चलीं आश्रम-सदन से
अनुकम्पा के सहित,
तमसा-स्रोत में अभिलाषा रख स्नान की ।
तमसा ने सती को पाकर त्वरित
गोद में बिठा सदुलार
आलिंगन किया तरंग-बाहें पसार ॥ (९)

सुधा-मधुर स्वन में
सन्तुष्ट-अन्तःकरण
बोली तमसा :
‘आशा नहीं थी माँ ! मेरे मन में,
राजलक्ष्मी-हृदय-हार सीता सती
भोग-पिपासा सब त्याग
मेरी गोद में विहार करेगी सानुराग ।
लोग कहेंगे मुझे भाग्यवती
तेरे ही कारण
संसार में करके मेरी प्रशंसा ॥ (१०)

घूमती फिरती वन-वन में
गण्ड-कुहुक में न उलझ,
कई बाधाएँ करके पार
अपने निर्मल जीवन में,
न दुःख मान अन्धकार,
प्रकाश न सुख समझ
चली हूँ दूर रास्ते नम्र मस्तक ।
जन्म कर रही हूँ सार्थक
नीर-दान से निरन्तर
सभी तटवासियों के मानस में तृप्ति भर ॥ (११)

उन सारे गुणों से हैं भरी
मेरी तरह मन्दाकिनी और गोदावरी ।
[3]
फिर भी उन्होंने बढ़ाया है गौरव,
पाकर तेरे पावन चरण-चिह्न अक्षय वैभव
और देवत्व-प्रदायक दुर्लभ
शुभांग-सौरभ ।
उन्हें प्राप्त करने मेरी कामना थी,
उनके बिना मैं लाञ्छित-मना थी ॥ (१२)

किया था मैंने शुभ कर्म आचरण,
धर्म ने मेरे समीप इसी कारण
तुझे पहुँचा दिया समय पर
मेरे हृदय की अभिलाषा समझ कर ।
पायी है मैंने दुर्लभ सम्पदा,
प्राप्त करूंगी तृप्ति सदा
प्रत्यह तुझे बुलाकर
अपनी गोद में लाकर ।
हर लेगा तेरा अंग-सौरभ, अरी माँ !
मेरे जीवन की समस्त कालिमा ॥ (१३)

मेरी गोद में केलि करते सरस,
दलबद्ध हंस सारस
चक्रवाक युगल-युगल
साथ बक सकल ।
तेरे पुण्यमय कलेवर के
क्षालन से पवित्र मेरा सलिल पान करके
ये जीवित रहेंगे मेरे पास
रच नित्य निवास ।
यश तेरा गाते रहेंगे
कलरवों के व्याज इधर,
मेरे श्रवणों में जगाते रहेंगे
सन्तोष निरन्तर ॥ (१४)

पतिव्रता-अंग से लगकर
पवित्र करने अपना कलेवर
त्याग वल्लरी-आवास,
वैरागी पुष्प सकल
दूर-दूर से डूब उछल
बहकर दौड़ते रहेंगे,
फिर मँडराते रहेंगे
आकर तेरे पास ।
कृपामयि ! तू स्नान के समय
सलिल में मेरे,
उन्हें हटाएगी नहीं सदय
चरणों से तेरे ॥ (१५)

मेरे तट पर चरण रखकर
तू विहार करेगी माँ ! सुखकर,
उसी व्याज से करेगी देव-द्युति प्रदान ।
पाकर उसे हरियालीभरे वन्य तरुगण
करेंगे देव-दर्प धारण
और शान्ति विधान ।
पल्लवों में पाटल श्यामल सुन्दर
आभा रहेगी निर्मल निरन्तर ॥’ (१६)

सीता बोलीं : ‘ यह नीर कितना निर्मल,
मधुर जैसे नारिकेल-जल ।
है नहीं नीर यही,
साक्षात् माता का क्षीर सही
पर्वत-उरज से प्रवहमान,
मृतप्राया सीता के लिये अमृत-धारा समान ।
ओह ! इस देश में तू तो है मेरी माँ
तमसा का रूप लेकर यहाँ ।
हो गया है विदीर्ण गहरा
मेरे दुःखों से हृदय तेरा ॥ (१७)

तेरा पृष्ठ-भेद हुआ है दरार से,
दूसरा पार्श्व दृश्यमान ।
फिर भी करने कन्या की तुष्टि विधान,
स्नेह-नयन खोल
प्रीतिभरी मीठी वाणी बोल
चाटु करती तू दुलार से ।
माँ ! धन्य-धन्य हृदय तेरा
मेरे दुःख-आतप के लिये सिकताभरा ॥ (१८)

श्रीराम-साम्राज्य में जो सीता
जन-नयनों में दूषिता चिर-निर्वासिता,
वह तेरे विचार में
दिखला अपना पातिव्रत्य-धर्म बल
पवित्र कर सकेगी संसार में
स्थावर जंगम सकल ।
समझती अपनी
पुत्री का दुःख जननी ।
पुत्री यदि वा दग्ध-वदना,
माता के नैनों में भाती चन्द्रानना ॥ (१९)

निश्चित तेरा तट प्यारा
हो चुका मेरा चिरन्तन सहारा ।
भरोसा तेरे शान्तिमय चरण-कमल ।
जिसके लिये शून्य चराचर सकल,
माता की गोद ही उसके लिये महान्
दुनिया में अपार आदरों की खान ।
माता जिसकी रत्नगर्भा धरित्री,
दूसरा स्थान भला क्यों खोजेगी पुत्री ?’ (२०)

तमसा नीर सुनिर्मल
सुशीतल पवित्र,
उस-जैसा मुनिकन्याओं का चरित्र ।
बन गयी उनका स्वरूप अविकल,
स्नेहोत्कण्ठिता तमसा
प्रतिबिम्ब के व्याज सहसा ।
उन्हें आलिंगन कर उत्सुक-मन
मिला दिया उसने तन से तन ॥ (२१)

इस प्रकार पाकर शुभ अवसर
समीप सीता के रहकर,
निरन्तर निहारने के लिये
बुद्धिमती तमसा ने प्राप्त किये
कई शरीरों में कई नयन,
कई हृदय कई मन ।
समान धर्म से समान गुण से मिल
चित्त बहुगूण प्रसन्न रहता खिल ॥ (२२)

स्नान सम्पन्न करने के बाद
लौटकर पूजे वाल्मीकि-चरण सबने,
प्रदान किया शुभाशीर्वाद
प्रसन्न-मन मुनिवर ने :
‘ज्ञान-धनार्जन से करके साधना
प्राप्त करो उत्तम साफल्य अपना ।’
विशेष रूप से सीता से कहा सादर :
‘वत्से ! वीर-प्रसविनी बनो निडर ॥ (२३)

कर ले वत्से ! पुत्र समान
इन आश्रम-तरुओं का तत्त्वावधान
अपना स्नेह-श्रम प्रदानपूर्वक ।
हो सकेगा तेरा अनुभव सार्थक
स्वभावतः उसी भाव से,
संसार में पुत्र-रत्न दुर्लभ कैसे ।
दूर करने तेरे सभी अभाव इधर
अनुकम्पा रहेंगी तत्पर ॥’ (२४)

मुनिवर की अनुज्ञा से चलीं सब निरलस
पद्म-सुकुमार करों में लेकर कलस ।
कन्याओंके बीच भाती रही कान्ति सीता की,
जैसे स्फटिक-समूह में चमक हीरा की ।
प्रस्थान किया सबने
उपवन के प्रति,
शोभा बढ़ाई कानन ने
पाकर वही सम्पत्ति ॥ (२५)

सीता पधारीं वनलक्ष्मी के द्वार पर,
तब दिनकर-किरण से शोभायमान
वह उल्लसित-अन्तर
बिखरा मधुर मुस्कान
पल्लव-अधरों में
सुन्दर मधुक-दन्तपङ्क्तियों में,
सादर उसी क्षण
हरने लगी अन्तःकरण ।
अर्पण किया रंगशाल्मली-अर्घ्य मंगल
साथ पाद्य दूर्वादल-शिशिर-पटल ॥ (२६)

प्रदान किया स्थलपद्म का आसन,
कहा सारिका-स्वर-छल में
प्रीति-पूरित मधुर स्वागत वचन ।
खिलाकर नव पंकज जल में
शरत्-सरसी भ्रमर-स्वन में जैसे
कहती कलहंसी से,
वनलक्ष्मी बोली
वाणी मधुभरी :
‘तेरे चरण-अरुण से आली !
बीती मेरी वेदना-विभावरी ॥ (२७)

सौभाग्यवश तुझे मैंने पाया,
आकाश-प्रसून सत्य अपनाया ।
समाया मेरे मन में
आनन्द अपार ।
चित्रकूट-उपत्यका में,
सिद्धगण-सेवित दण्डकावन में,
पारावार के उस पार
लंकापुरी की अशोक-वाटिका में,
तुझे अपने सामने
आदर्श मानकर मैंने
चौदह वर्षों तक रची
प्रीति-प्रतिमा सच्ची ॥ (२८)

आ रही थी जब लौट चली
पुष्पकारूढ़ तू गगन-मार्ग पर,
खड़ी मैं तब ले पुष्पाञ्जली
हरिण-नयनों में शोकभर
ऊपर को निहार,
तुझे मयूरी की बोली में पुकार
रही थी बड़ी चाह से,
लम्बी राह से ।
अरी प्यारी !
सहेली की बात मन में करके याद
क्या तू आज पधारी
इतने दिनों बाद ? (२९)

आली ! लम्बी विरह-व्यथा
मैंने विशेष झेल न पाकर सर्वथा
अन्तिम चिन्ता से तापसी-वेश अपनाया,
तेरे हृदय-दर्पण में सस्नेह-रस प्रतिबिम्ब डुबाया ।
तुझे कर लिया वरण
हर्षित-अन्तःकरण ।
धन्यवाद अपार
कर ले स्वीकार,
जो तूने सश्रद्ध पूर्ण की
मेरी कामना हार्दिकी ॥ (३०)

साधु-संग प्राप्त होने से
सद्भाव सदा अटूट रहता,
नभोमण्डल में जैसे
नील रंग की अमिट सत्ता ।
साधु-बन्धु के पास कभी
मनोवाञ्छा होती नहीं निष्फल,
पा सकी मैं इसी कारण अभी
तेरे दर्शन सुमंगल ।
यह सफलता, सखि ! सौभाग्य से मिलती,
तेरे भाव ने मुझे बना दी भाग्यवती ॥’ (३१)

बुझाने सती-हृदय-वन-ग्रासी
प्रखर विरह-दावानल,
मानस में उस पल
मधुमोहिनी वही
कानन-लक्ष्मी भाती रही
नवोदित मेघमाला-सी ।
बोलीं जनक-कुमारी
स्नेहमय वचन :
‘तेरे कारा में, अरी प्यारी !
मैं बन्दिनी बन गई आजीवन ॥’ (३२)

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(पादटीका :
[1] कुम्भाट = पक्षीविशेष ।
[2] कलिंग = पक्षीविशेष ।
[3] मन्दाकिनी = चित्रकूट की एक गिरिनदी ।)
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(तपस्विनी काव्य का चतुर्थ सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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Saturday, August 20, 2011

Tapasvini Kavya Canto-10 (‘तपस्विनी’ काव्य दशम सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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[Canto-10 has been taken from pages 180-190 from my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see :
' Tapasvini : Ek Parichaya'
Link : http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-10]
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


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दशम सर्ग
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पाकर तनय-रत्नद्वय
यत्न करके प्राणातिशय
तत्पर हुईं लालन-पालन में जनक-तनया,
निविड़ स्नेह-बन्धन लग गया ।
एक पल न छोड़ा समीप उनका,
हल्का समझा भार जीवन का ॥ (१)

स्नानार्थ दिन में एक बार वैदेही
थोड़ी दूरी में रहतीं तो आर्द्र वस्त्र में ही
दौड़ चली आतीं सत्वर
अत्यन्त व्याकुल-अन्तर ।
व्यग्र रहता उनका जीवन
करने नन्दनों के वदनारविन्द दर्शन ॥ (२)

शर्वरीश-कला का गर्व कुचल
बढ़ने लगे कुमारों के अंग युगल ।
आनन पूर्ण सोम समान
दिनोंदिन बने सौन्दर्य-निधान ।
मुख जननी का वे लगे पहचानने,
उन्मुख होने लगे गोद में उठने ॥ (३)

हँसते थे माता का मुख निहार,
गोद ढूँढ तुरन्त रोते ।
जननी वहाँ करके दुलार
गोद में बिठाने से आनन्द-झूलों में मस्त होते ।
निहार वदन बारबार
हँसते-हँसते हँसाते थे युगल कुमार ॥ (४)

मन में नहीं थी सती की कल्पना,
देखा भी नहीं था सपना ।
अपने दग्ध वदन में पुनर्बार
छा जायेगा मुस्कान का निखार ।
अपूर्व सुख की अपूर्व मुस्कुराहट
अपने आप हो जाती थी प्रकट ।
स्वामी ने नहीं लिया उस सुख का हिस्सा,
सोचकर मन में ऐसा
अपने भाग्य को सती
प्रतिदिवस थीं कोसती ॥ (५)

वदन-सरोज में रदन के बहाने
विराज समुज्ज्वल वाग्‌देवता ने
निसर्ग ज्योति बिखराई अपनी
कुन्द-चन्द्र-हिम-मोती-जयिनी सुहावनी ।
बजाई पहले वीणा मनोरमा,
सजाकर सुर
मृदुल मधुर
मा मा मा मा मा मा ॥ (६)
[1]

वही स्वर्गीय स्वन मलय पवन बन
पल्लवित करता जननी का जीवन ।
माता के अधरोष्ठ पर संग-संग
निखर आता प्रवाल-पाटल रंग ।
बढ़ती थीं दशन-पुष्प की कलियाँ उधर
लेकर चाँदनी की आभा सुन्दर ॥ (७)

मन भास्कर-सा भास्वर,
अधिकार कर इन्द्रासन का,
[2]
कुबेर-कोष की ओर हो अग्रसर
ससन्तोष बढ़ाता था प्रभाव वदन का ।
सोचता, अपना हस्तगत अभी
संसार सुख सौभाग्य सभी ॥ (८)

वाणी तुतली बोलने लगे दोनों कुमार
अधखिले सरसिज जिस प्रकार ।
उन भारती के हाव मनोरम,
नयन-विलास, लावण्य-विभ्रम
और सौम्य वेश निहार
होता था सती-प्राणों में पुलक-संचार ।
मोह था नृत्य-तत्पर
मन-भवन में निरन्तर ॥ (९)

बैठे चले
धरती के तले
धीरे-धीरे दोनों प्यारे
जानु-करतलों के सहारे ।
कुछ दूरी में ठहर
सती ने सहर्ष पुकार कर
चलन-शक्ति उनकी बढ़ाई ।
मुस्कुराकर सकौतूहल
माता के समीप चंचल
चले जाते दोनों भाई ॥ (१०)

कभी हाथों में मिट्टी लेते,
जिह्वा पंकिल कर देते ।
माता सुन्दर फल पकड़वातीं उन्हें,
वदन हिलाकर फेंकते मुन्ने ।
चारु चूर्ण चिकुर डोलकर भाते,
जैसे अरविन्द पर मिलिन्द मँडराते ॥ (११)

माता के हाथ थाम होने लगे खड़े ;
क्रम से अपने पैरों पर
दोनों करके निर्भर
चलने लगे हाथ पकड़े ।
अपने आप चरण चला फिर
क्रन्दन करते थे जब जाते गिर,
तब सती चूम सौम्य वदन
प्रसन्न करातीं उनका मन ॥ (१२)

वन-पंछियों को दोनों पुकारते,
सकौतुक उनका मनोहर रंग निहारते ।
मयूरों को पकड़ने दौड़ते,
पंखों को चाहते समीप जाकर ।
मृग-छौनों को पकड़ क्रीड़ा करते
सुमनों से उनका वेश सजाकर ॥ (१३)

कुमारों को ले घुमाते कानन के भीतर
तापस-तापसीगण प्रफुल्ल-अन्तर ।
उनके मस्तक और कपोल
सुमन-मालाओं से सजाते,
कुसुमित लताओं के झूलों में झुलाते ।
‘और’ ‘और’ बोल
हठ करते युगल सहोदर
खुशियों की कलियाँ खिलाकर ॥ (१४)

कुमारों के उज्ज्वल श्याम कलेवर
फूलों के झूलों में लगते नयन-प्रीतिकर ।
वनलक्ष्मी जैसे नथिया सुन्दर
लाड़ से डुलाती हरिन्मणि से अलंकृत कर ।
तरु-शाखा डोलने लगती
संग ले मस्ती ।
हँसी उड़ाकर दूसरी शोभाओं की,
दिखलाती भंगी भौहों की ॥ (१५)

मृगराज-बल से कुमारों को मण्डित कर
क्रम से बीत गये पाँच वत्सर ।
सरिता, उद्यान, शाद्वल, कानन में विहार
करने लगे स्वच्छन्द युगल कुमार ।
श्वापद-विपदाओं को मानता नहीं तनिक
उनका मन निर्भीक ॥ (१६)

चूड़ाकर्म कुमारों का उधर
सम्पन्न कर यथाविधान
ज्ञानोदधि महर्षि वाल्मीकि ने
बना दिये उन्हें
केशरी बलवान्,
लाकर सुदुस्तर विद्या-वन के भीतर ।
अज्ञान-कुञ्जरों का करने लगे संहार
वहाँ विहर दोनों कुमार ॥ (१७)

रस-रत्नभरा काव्य-सानुमान्
जहाँ राम-मृगराज विराजमान ।
रावण-गज की रुधिर-धार झर-झर
बहती बनकर निर्झर ।
रोतीं सिंही आश्रय कर गिरि-कन्दरा
झेल दन्तावल के दन्ताघात का दुःख गहरा ॥ (१८)

ऋषि-शेखर ने उस शैल के शिखर
कौशल से कुमारों को चढ़ाकर
खिलवाया उन्हें मृग-शावक मान,
परन्तु वे खेलने लगे शार्दूल समान ।
रामचन्द्र को किया मृगेन्द्र ज्ञान
सिंह-शावकों ने पिता को न पहचान ॥ (१९)

माता के समीप युगल नन्दन
करते महर्षि-प्रणीत रामायण गायन ।
वीणा बजाकर तान-लय संग सुस्वर
रामभक्ति-रस में मन डुबाते,
प्रेम-लहरों में अस्थिर होकर
अपने मस्तक नयन डुलाते ॥ (२०)

गान-गान में होते प्रकटित
तर्जन, गर्जन, विलाप हास्य सहित ।
स्फीत हो उठते वक्षस्थल
साथ बाहु-युगल ।
कभी-कभी बहने लगता
नयनों से नीर ।
काव्य-भाव की विद्युल्लता
प्राणों में समा जाती गभीर ॥ (२१)

कुमारों की रसना में रम्य-मूर्त्ति शोभना
निर्मल समुज्ज्वल नवीन भारती,
करके विचित्र मधुर लास्य रचना
थीं उल्लास वितरती ।
बरसाता उल्लास वही बनकर बादल
प्राण-प्राण में पीयूष-धारा सुविमल ॥ (२२)

तापसियाँ सीता के संग उधर
विशुद्ध संगीत-सुधा पानकर
हर्ष विषाद शान्ति सन्ताप सहित
सुख दुःख अनुभव करतीं अमित ।
आनन्द-क्षोभ से जाता हृदय पिघल,
बह जाता नयनों से अश्रु-जल ॥ (२३)

रामायण-नायक राघव के हृदय-हार की
मध्य-मणी जो जानकी,
कुमारों की हैं गर्भधारिणी जननी,
भागीरथी-तट-काननवासिनी बनी ।
थी यही बात
कुमारों को अज्ञात ।
छुपा उसे रखा था
महर्षि के निषेध ने सर्वथा ॥ (२४)

गाते राम-सीता के गुण-गौरव
अतिशय उत्सुकता से कुश लव ।
लज्जित रहतीं सती ले श्रवण-रस,
सुख में डुबा देतीं मानस ।
गोपन रख अपनेको सावधान
समय यापन करतीं तापसी-समान ॥ (२५)

रमणीय काव्य रामायण
सुन विमुग्ध मृगगण
लगा श्रुति करते ध्यान
निश्चल नयनों में काष्ठ-मृग समान,
भूल सब आहार ग्रास
विचरण प्यास ।
भरते मौन विहंगकुल
हृदय में श्रुति-संपत्ति अतुल ॥ (२६)

पादपगण पूर्णकुण्ड-कवरी के अन्दर
भर पुष्प-गुच्छ सुन्दर
अनुगान में रहते मगन,
करके साभिनय लता-हस्त की भंगी प्रदर्शन ।
लेटती रहती विभोर तमसा
अपूर्व आनन्द में विमुग्ध-मानसा ॥ (२७)

वसुधा के उर पर
धन्यवाद-ध्वनि में नृत्य-तत्पर
सुधा बहने लगती ।
चहुँदिशाओं से आये वनवासी-जन
उसी धारा में रहते मगन ।
अशेष श्रुति-गह्वर में उछल
अमरावती को प्रतिपल
वही धारा प्लावित करती ॥ (२८)

ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र आदि देवगण
वही गान सुन करते धन्यवाद अर्पण ।
प्रतीची, प्राची,
उदीची, अवाची,
सारी दिशा-सुन्दरियाँ
नृत्य करतीं ले मस्तियाँ ।
अपने गान-गर्व की टोकरियाँ बिखराकर
संग गन्धर्वों के अप्सरायें रहतीं तत्पर ॥ (२९)

लोक-लोक में करके विहार
व्यक्त करने लगे हर्ष अपार
मुक्त-कण्ठ मधुस्वर
नारद मुनिवर,
प्रशंसा कर वाल्मीकि-कविता-रस की,
सीता-राम के विमल यश की,
उनके पुत्रों के गायन की
और सुधावर्षी वीणा-निस्वन की ॥ (३०)

विश्व-विश्रुत जिनकी
अपनी वल्लकी,
वे बालकों की वल्लकी से आनन्दित स्वयम्
उसे कहकर उत्तम
प्रचार करने हुए तत्पर,
धन्य धन्य वे मुनिवर ।
दूसरों की प्रशंसा की प्रफुल्ल-मन,
साथ साथ किया अपना गौरव वर्धन ॥ (३१)

अपने गुणों के रहते लोग मुक्तस्वर
दूसरों के सद्गुणों की प्रशंसा में प्रवीण होकर
स्वगुण-पादप फलाते ।
धनुर्गुण से ही तीर चलाये जाते ।
सुमन-सुगन्ध ले समीरण
करता संसार में अधिक आनन्द वितरण ॥ (३२)

एकादश-वर्ष-वयस्क
हुए जब युगल बालक,
सम्पन्न हुआ उनका उपनयन ।
वेदाध्ययन बाद प्राप्त किये ज्ञान-नयन ।
प्रतिभा देख वेदज्ञ युगल सन्तान की
सारा दुःख त्याग देतीं जानकी ॥ (३३)

यमुना-नीर में अरुण-किरण की भाँति
नवीन तरुण रमणीय कान्ति
विचित्र कौशल दरशाकर
यमज कुमारों के श्यामल कलेवर में इधर
धीरे-धीरे लगी मण्डन करने,
वरुण-भण्डार से ऋण लेकर रत्न-किरनें ॥ (३४)

उनकी ज्ञान-मार्जित भाषा अपनी
श्रुति-हृदय की बनी पावनी ।
भाषानुसार हुआ व्यवहार,
चरित्र में देवत्व का सञ्चार ।
देदीप्यमान मानस, वचन और कलेवर
तीनों ने जीवन में रची प्रभा की लहर ॥ (३५)

श्लोक पाठ करते जब युगल नन्दन
भर जाता सुख-ज्योति से माता का जीवन ।
शोक-स्मृति की विभावरी
बन जाती अधिकाधिक मनोरञ्जनभरी ।
सुख का मूल्य समझता दुःखीजन,
सदा-सुखी का सुख वहाँ तुल्य नहीं कदाचन ॥ (३६)

निहार तनय-युगल के प्रफुल्ल रूप नूतन
रत्न-स्तूप मानते जननी-नयन ।
पुत्र-प्रशंसा माता की स्मृति में समाती,
सुधा की मधुर धारा बन जाती ।
उसमें स्वामी का सुयश महीयान्
सती के लिये बन गया स्वर्ग-सोपान ॥ (३७)

माता की गोद जिस दिन से त्याग कर
यमज बालक विहरने लगे निडर,
उसी दिन से जानकी अनुक्षण
करने लगीं तपोव्रत आचरण ।
बिताने लगीं अवशिष्ट जीवन
पति-चरणों में समर्पित-मन ॥ (३८)

ग्रीष्मकालीन नदी-प्रवाह की भाँति हो चला
सती जानकी का जीवन दुबला ।
कृष्णपक्षीय चन्द्र तुल्य उसने समझ ली
मृत्यु अमा-रात्री अपनी लक्ष्य-स्थली ।
[3]
स्वामी श्रीराम को मान
अंशुमान् समान
की यही कामना,
उससे संगम होगा अपना ॥ (३९)

सोचतीं सती : ‘ किसी प्रकार
स्वामी के पावन चरण दर्शन कर एक बार
समर्पित कर युगल नन्दन
तोड़ देती मेरे तन का बन्धन ।
उस मुक्ति-वन में प्राण-मृग मेरा
तुरन्त जाकर रचता अपना बसेरा ॥’ (४०)

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(पादटीका :
[1] ‘सा रे गा मा पा धा नि’ - इन सात स्वरॊं में से ‘मा’ स्वर । अन्य अर्थ में ‘माँ’ उच्चारण ।
[2] इन्द्रासन = इन्द्र का आसन और पूर्व दिशा । कुबेर-कोष = कुबेर का भण्डार और उत्तर दिशा ।
[3] अमावस्या में सूर्य-चन्द्र-संगम होता है ।)
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(तपस्विनी काव्य का दशम सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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Friday, August 19, 2011

Tapasvini Kavya Canto-2 (‘तपस्विनी’ काव्य द्वितीय सर्ग/ हरेकृष्ण मेहेर)


TAPASVINI
Original Oriya Mahakavya by :
Svabhava-Kavi Gangadhara Meher (1862-1924)

Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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[Canto-2 has been taken from pages 47-62 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.]
For Introduction, please see : ‘ Tapasvini : Ek Parichaya ‘
Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html

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Tapasvini [Canto-2]
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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द्वितीय सर्ग
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वाल्मीकि-आश्रम-राज्यभर
व्याप्त था शान्ति-रानी का राजत्व सुन्दर ।
तरु-दत्त उत्तम छाया-करों से सर्वथा
कोष उसका परिपूर्ण था ॥

निष्कपट-अन्तर
वे पादपगण छाया-कर
प्रदान करते अयाचित
अपने तनु-मापदण्ड के अनुरूप निश्चित ॥

प्रकृति के रण में निर्भीक
वे फिर बनते हैं सैनिक,
गहन पत्र-कवच लेकर
आच्छादित करके कलेवर ॥

वर्षा के व्यायाम से भर
अपने अंगों में पुष्टि-शक्ति,
आतप को परास्त कर
छीन ले आते रश्मि-सम्पत्ति ॥

शीत के आक्रमण से ये
राज्य-रक्षा के लिये
धुनि-रूप में उधर
कुछ बन जाते अग्नि-शर ॥

पराजित प्रकृति उचित समय जान
करती सन्तोष विधान,
वृक्षों के हाथ सौंप अपार
फल-पुष्प-कोष सम्भार ॥

प्रत्येक शिशिर-कण
करता अगस्त्य का गौरव शोषण,
अपने गर्भ में धारण कर
तारा-रत्न-पूरित अम्बर-सागर ॥

तरु-आलबाल का उदक उधर
अपनाकर रत्नाकर का गर्व विशाल,
रखता रहा अपने उदर
सुधांशु-मण्डल को पाल ॥

वहाँ अचानक चली आई
श्रीराम-वधू की रुलाई ।
शान्तिदेवी का आगार
डगमगा दिया बारबार ॥

शान्ति करुणामयी
विचलित हो गयी ।
ढूँढा वाहन अपना सत्वर
चलने रोदन-रता को लक्ष्य कर ॥

मुनिकन्याएँ बाहर निकल
लग गयी थीं उसी पल,
तत्त्वावधान करने नव तरु-लताओं का,
जो अस्तव्यस्त थे पाकर मरुत का झोंका ॥

श्रुति में कन्याओं की जब समा गयी
आकर एक ध्वनि नयी,
उसे पकड़ पहचानने
मनोनिवेश किया सबने ॥

उसे पकड़ मानस ने देखा चुन :
न वह कबूतर की बोली,
न कूक कोयल की निराली,
न वीणा की धुन,
न कम्बु-स्वन, न फिर मयूर-केका,
वह तो किसी रमणी के करुण गले का
झर रहा है स्वर
शोक-जर्जर ॥

उन कन्याओं के हृदय-स्यन्दन पर
स्वयम् अधिरूढ़ होकर
शान्ति ने तुरन्त किया चालन,
फहरने लगा वल्कलाञ्चल-केतन ॥

चकित हो गयी शान्ति तभी
निहार लहरें रुलाई की ।
निकट चलने फिर भी
तनिक-भी अवहेला नहीं की ॥

आगे चल व्यग्र-मन
कन्याओं ने अनतिदूर में किया अवलोकन,
बरसा रही लोतक-नीर भारी
एक अपूर्व नारी ॥

किसी ने सोचा साश्चर्य मन में :
‘विचित्र तो बात यही ।
कभी सम्भव नहीं इसी कानन में
इस-जैसी मानव-देही ॥

कोई देवी स्वर्गधाम से
क्या सद्य अभिशाप-परिणाम से
आ गिर पड़ी है सशरीर
धरातल पर अधीर ?

क्या चढ़कर ऐरावत करी
इन्द्रभुवन-सुन्दरी
अम्बर में करते करते भ्रमण
भूपतिता हुईं इसी क्षण ?’

सोचने लगी अन्य कोई मुनि-दुहिता :
‘क्या यह मूर्त्तिमती सुर-सरिता
अश्रु-तरंगों से अपनी
प्लावित कर रहीं अवनी ?

क्या करका-सी करुणा स्वर्ग से टपक
अन्य के दुःख-ताप से अचानक
जा रही पिघल
धीरे-धीरे आ धरातल ?

नहीं तो, घन-कुन्तला यही,
लेकर बलाहक
तारा आने से खिसक
धरा पर धारा बह रही ॥

ध्वनि रुलाई की होती यदि चौंकभरी,
हम कहते, मेघ संग शम्पा है उतरी ।
कहाँ कोयल की बोली से सुहावनी
ओस-बरसानेवाली चाँदनी ?
कहाँ झिल्ली-झाँझ से भरी
ग्रीष्म की धूप गहरी ?

हाथों में यदि वीणा रहती,
हम कहते, देवी सरस्वती
विलप रही हैं इस तरह से
तड़पकर विष्णु के विरह से ॥’

मुनिकन्याएँ करके ऐसी भावना
पहुँच गयीं सीता के निकट,
परन्तु प्रदान करने सान्त्वना
किसीका न हुआ साहस प्रकट ॥

प्रबल वृष्टि से महानदी का गहरा सलिल
जब हो जाता आविल,
उसे कैसे भला
निर्मल कर सकती निर्मला ? (१)
इब,अंग और तेल नदियों के संग
जैसे बढ़ती महानदी की धार,
मुनि-कुमारियों के संग
बढ़ने लगी सीता की वेदना उसी प्रकार ॥

कुछ न पूछ वैदेही से
घिर गयीं कुमारियाँ सारी ।
कोई भी जा न सकी वहीं से,
स्नेह बन गया पाँव की बेड़ी भारी ॥

सीता की ओर करके विकल निरीक्षण
कुमारियों से शान्त नयन उसी क्षण
छोड़ने लगे प्रबल
क्षुब्ध हृदय की व्यथा-लहरों का जल ॥

साश्रु-लोचना कुमारियों के बीच वहीं
सकरुण स्वर विलपती
शोक-सलिल में बह रहीं
राम-प्रिया सीता सती ।
चक्रवातज सीकर-सिक्त नलिनी-वन में तरसी
कूजती रही क्या करुण-स्वना राजहंसी ?

करुण रुलाई उनकी
कोई आली झेल न सकी ।
महर्षि वाल्मीकि के पास चल
बोली वचन स्वेदभरा व्यथा-चञ्चल ॥

‘तात ! इसी कानन में
दीखती है कोई नारी
नवनीत की पुतली-सी,
आकर रो रही पगली-सी ।
अपने प्रिय स्वामी को पुकार
वही बारबार
एकान्त में स्मरण कर रही मन में
पति की गुणावली और वत्सलता सारी ॥

दीखती उसके ललाट पर
सिन्दूर की बिन्दी सुन्दर,
वदन-अरविन्द को वही
पूनम के चाँद-सी भाती रही ॥

हस्त-युगल में खनकी
सुहावनी लगतीं चूड़ियाँ रत्न की ।
विषाद-पारावार के पुलिन पर
चमकतीं वहाँ न डूबकर ॥

अधखिले कमल में वराटक समान
अरविन्दाभ सुन्दर वस्त्र से वह शोभायमान ।
आँसुओं ने कर दिया
आर्द्र उसीका परिधान,
वह मानवी या देवी स्वर्गीया,
सरल नहीं पहचान ॥’

यह श्रवण कर तपोधन
मौन मुद्रित-नयन,
बैठे रहे एक पल
रख काय मस्तक ग्रीवा सरल ॥

उठ फिर निकल पड़े
‘चलो देखेंगे’ कहकर ।
कई मुनिकुमार चल पड़े
उनके पीछे-पीछे सत्वर ॥

जो मुनिकन्याएँ थीं आश्रम के भीतर,
चलीं सब उत्सुक-अन्तर,
बनकर उस सखी के साथी
जो बुलाने आई थी ॥

चले कुरंगी कुरंग,
उनके शावक भी संग-संग ।
तरु से तरु कुद-कुद चले चञ्चल
कई मयूर कोकिल बक दल ॥

पवन-पारावार में लगे खेने
कलेवर-पोत अपने अपने
नेत्र-रञ्जन खञ्जन विहंग
कपोत, शुक सारिकाओं के संग ॥

शान्ति की इस वीर-वाहिनी ने
किया सबल अभियान,
सीता के शोक-प्रस्तर-समूह उमड़ने
प्रखर सरिता समान ॥

महानदी महानदी की महाधारा आकर
रामेश्वर की सारी शिलाओं को पाकर (२)
यदि मस्तक तक निगल जाये,
शिलायें हिलेंगी क्या ये ?
समस्त प्रवाह
लगेगा काँपने ।
होगा सिरभ्रम, मिलेगी नहीं राह,
फिसल जायेंगे पैर अपने ॥

इस अभियान में चली
शान्ति वही दशा तो नहीं भोगेगी ?
उसे लगने दो, वह तो है लगी
स्वाभिमान से मतवाली ॥

कुछ दूर चल मुनिवर
सीता के समीप पहुँचे ।
बाकी सब रहे घिरकर
नीचे, डाल पर, अम्बर में ऊँचे ॥

धवल-श्मश्रु-केश
विभूति-विभूषित रम्य-वेश
वाल्मीकि महर्षि के पास वैसे
भाने लगीं सीता काञ्चन-वर्णा,
तुषार-काय हिमालय तले जैसे
मौन निश्चल तपस्विनी अपर्णा ॥

महामुनि के आगमन पर
शोक दूर हो गया सीता का ।
हृदय में स्थगित हुआ सत्वर
जलावर्त्त चिन्ता का ॥

कहा महर्षि ने जानकी से :
‘मुझे ज्ञात है वत्से !
विपरीत बहने लगी है सम्प्रति
तेरी विरह-विपत्ति ॥

सागर के प्रति
सरिता की गति
रहती स्वभाव से ।
जब शिला-गिरिसंकट
सामने विघ्न-रूप हो जाते प्रकट,
उन्हें लाँघ जाती ताव से ॥

भूल जाती सब
पिछली व्यथाएँ सागर से मिलकर ।
दोनों के जीवन में तब
रहता नहीं तनिक-भी अन्तर ॥

संयोग-वश यदि बीच में उभर
ऊपर को भेदकर
छिन्न कर डालता बालुका-स्तूप,
सरिता और सागर के हृदय को किसी रूप,
वह स्रोतस्वती
मर तो नहीं सकती,
सम्हालती अपना जीवन-भार
ह्रद-रूप बन हृदय पसार ॥ (३)

दुनिया में वही दशा तेरी
अविकल आई है, माँ मेरी !
तू व्यर्थ चिन्ता मत कर,
चिन्ता का स्वरूप है भयंकर ॥

तेरे श्वशुर सुहृद् मेरे,
वैसे ही पिता तेरे ।
आश्रम में रह तू निःसंकोच,
सारे संसार को तिक्त सोच ॥

मेरे आश्रम में किसी भी प्रकार
रहेगा नहीं तेरी चिन्ता का अवसर ।
जन्म लेगा जो कुमार
उसके लिते शोचना मत कर ॥’

सुन बातें मुनिप्रवर की
उनके चरणों में प्रणाम कर सादर
उठकर पोंछने लगी जानकी
वस्त्राञ्चल से कपोल-परिसर ॥

‘वीरप्रसू हो वत्से !’
इस शुभाशीष वचन से
देने लगे मधुर सान्त्वना तपोधन ।
फिर बोले, ‘आ विलम्ब न कर मेरी माँ !
कर मेरे आश्रम का सौन्दर्य वर्धन
कुमारियों के बीच रहकर यहाँ ॥’

‘बालिकाओं ! पकड़ लो सत्वर
क्या क्या वस्तुएँ हैं इधर ।’
मुनिवर की अनुज्ञा मान
कन्याओं ने वैसा ही किया ससम्मान ॥

खींचतान परस्पर
पकड़ सीता की सुन्दर टोकरियाँ,
ले चलीं सादर
घिर उन्हें चारों ओर कुमारियाँ ॥

दुर्गति के मस्तक पर बारबार
करके पादुका प्रहार
मुनिवर धीरे-धीरे चलने लगे
श्रीराम-हृदय की प्रीति-प्रतिमा के आगे ॥

महामुनि कषाय-परिधान
भाये अनूरु समान, (४)
भाने लगीं उनकी अनुगामिनी
दिनकर-किरण-सी वैदेह-नन्दिनी ।
डूब गयी थी वही किरण
दुःख-पारावार-वारि में उसी क्षण ।
उधर थे अनूरु विराजित
समुज्ज्वल वर्णों से सुसज्जित ॥

महामुनि और महासती का समस्त वार्त्तालाप
सुन रहे थे विहंग-कलाप
धीरे बैठ उधर
त्याग अपना मधु स्वर ॥

देख उन्हींका प्रस्थान
आश्रम की ओर,
किया विहंगों ने मधुर गान
प्रफुल्ल-मानस आनन्द-विभोर ॥

शान्ति-रानी की तो पूरी
बज गयी रण-जय की भेरीतूरी ।
दरशाने लगे प्रसन्न भाव
नृत्य-मगन सारे मृग-शाव ॥

नये अतिथि का मुखमण्डल
मान स्नेह-पारावार,
प्यासे नयनों से वे सकल
निहार रहे बारबार ॥

अशान्ति-सिन्धु से उभरी
स्वयं राम-प्रिया सुन्दरी
जयलक्ष्मी बनकर
चल रहीं शान्ति-नगर ॥

चन्द्रिकामय पुच्छ सुन्दर
विस्तार करके ऊपर
वीथी-युगल में उभय पार्श्वगत
चलने लगे मयूर शत-शत ॥

कोमलांग समस्त हस्ती-शावक
सूँडों से कमल धारणपूर्वक
साथ दलबद्ध होकर
चले ढकेल परस्पर ॥

कुसुम-गुच्छ-विभूषित
पल्लव डोलने लगे वृक्षों में उल्लसित ।
वहीं बक सकल सुहावने
पङ्क्ति-सज्जित धवल ध्वज बने ॥

सुमधुर स्वर में कोकिल-कुल
गाने लगे मंगल गीत ।
भृङ्ग-गुञ्जार से मञ्जुल
जयशङ्ख-ध्वनि हुई प्रतीत ॥

बारबार वृक्षों से उड़कर
वहीं मुक्त-हस्त,
प्रसून बरसाने लगे पथ पर
शुक सारिका समस्त ॥

गोधूलि-तारका प्रज्वलित हुई उधर
बनकर वन्दापना-प्रदीप सुन्दर ।
मुनि-आश्रम में विराजने लगीं जानकी
तारका श्रीराम-नयन की ॥

मुनीन्द्र का निदेश मान
आश्रम में रख सारी पेटिकाएँ यथास्थान
सती सीता का वदन
किसी कन्या ने किया प्रक्षालन ॥

कोई दूसरी डालने जा रही
उनके पैरों में कलस का जल,
उसके हाथ से छुड़ा सीता ने स्वयं ही
धो लिये अपने चरण युगल ॥

किसी कुमारी ने सुकोमल पत्रासन पर
सती सीता को बिठाकर,
रख दिया सम्मुख फलमूल आहार
पत्र-थाली में लाकर सप्यार ॥

अनुकम्पा-नाम्नी वृद्धा ने
सती को अंक बिठा तत्काल,
कर-सरोज से अपने
पोंछ दिये उनके कपोल और कपाल ॥

ममता-प्रपात से सींच अनाविल
समुज्ज्वल स्नेह-सलिल
अनुकम्पा ने प्लावन से उसीके
शीतल किये प्राण राम-प्रेयसी के ॥

फिर उनका लपन निहार-निहार
कहा वचन धीर सुकुमार,
‘मेरे सौभाग्य से, माँ प्यारी !
आज तू मेरे पास पधारी ।
राजराजेश्वरी माँ तूने डूबाकर
अन्धेरों में अपना स्वर्ण-मन्दिर,
जगमगा दिया यहाँ आकर
मेरा क्षुद्र कुटीर ॥

दिनभर नहीं किया होगा ग्रहण
तूने कुछ भी भोजन ।
प्रहारता होगा चरण
उदर के अन्दर नन्दन ॥

खा ले अरी माँ ! खा जा,
तेरी माँ के घर कैसी लज्जा ?
ये तेरी सखियाँ सारी
कर रहीं तेरी प्रतीक्षा प्यारी ॥’

ऐसा कहकर अनुकम्पा ने छिलका निकाल
नारंगी-कलि हाथ में पकड़वा दिया तत्काल ।
फिर एक-एक करके पक्व कदली
कर्पूर-सी उजली ॥

दिये तिन्दुक बीज-फड़े,
पनस टुकड़े-टुकड़े,
मधुर पिण्ड-खर्जूर
साथ रसाल, रसों से भरपूर ॥

‘धीरे खा ले माँ ! खा ले’, इस प्रकार
बारबार मीठी बोली में कहकर तोड़ अनार,
हाथ में दिये पुञ्ज-पुञ्ज दाने ।
अन्त में लाकर ढेर
‘और दोठों और दोठों’ कहकर अनुकम्पा ने
खिलाये सती को आठ-दसठों बेर ॥

जननी का स्नेह-सुख समझा नहीं था
सती ने अपने बचपन में,
परन्तु वही सुख सर्वथा
समझा आज वाल्मीकि-वन में ॥

फलाहार के अनन्तर
आचमन सम्पन्न कर
मान वृद्धा तापसी का निदेश-वचन
किया सती ने काष्ठासन पर उपवेशन ॥

अर्पित की सतीके हाथ
इलायची किसी कन्या ने ।
उसे मुख में डाला आदर के साथ
सुमुखी जनक-तनया ने ॥

किसी कुमारी ने लाकर मनोरम
नीवार-नाल शुष्क सुकुमार,
उस पर बिछा मृग-चर्म
कर दी शय्या तैयार ॥

दो सखियाँ रहीं
सती के पास वहीं ।
बाकी थीं जितनी
चली गयीं पर्णशाला में अपनी ॥
= = = = = =


[पादटीका :
(१) निर्मला = जल-शोधनकारी फल-विशेष ।
इब, अंग, तेल - ये तीनों महानदी की उपनदियाँ हैं ।
(२) रामेश्वर = सम्बलपुर के पास महानदी का एक भयंकर विषम स्थान ।
(३) ओड़िशा में चिलिका-ह्रद-संगत नदियों की अवस्था इसका निदर्शन है ।
(४) अनूरु = सूर्य-सारथि ।

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(तपस्विनी काव्य का द्वितीय सर्ग समाप्त)
= = = = = = = =



[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]

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