Sunday, May 31, 2009

साहित्य में आधुनिकता एवं समीक्षा (Modernity and Criticism in Literature): Dr.Harekrishna Meher

Sāhitya me Ādhunikatā Evam Samīkshā
(Modernity and Criticism in Literature)  

Hindi Article By : Dr. Harekrishna Meher    
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साहित्य में आधुनिकता एवं समीक्षा      
· डॉ. हरेकृष्ण मेहेर       
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चाहे प्राच्य हो या पाश्‍चात्य, अच्छे गुणों का ग्रहण करके मूल्यबोध सहित उन्हें प्रस्तुत करना लेखक की प्रतिभा का सुपरिचायक होता है । विषय-वस्तु जो भी हो, औचित्यपूर्णता के साथ नूतनता का स्पर्श देकर नव्य काव्य का प्रणयन किया जा सकता है । परम्परा या प्राचीनता का दोष देकर आयातित वस्तुओं से आधुनिकता को प्रकट करना स्पृहणीय नहीं । आज की आधुनिकता आगामी दिनों में प्राचीनता के नाम से ही पहचानी जायेगी ।

अन्य भाषा-साहित्यों की तरह संस्कृत में भी हर विधा की सारस्वत साधना चली आ रही है । आधुनिक दृष्टि-कोण से व्याकरणानुसार नये-नये शब्दों का गठन और नवीन प्रयोग किये जा रहे हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उत्तम और सुचारु परिचालना हेतु एक सीमा यानी मर्यादा होती है । उसी प्रकार हर भाषा के प्रयोग में भी एक मर्यादा है । संस्कृत तो भाषा-जननी है । वह अपनी सुनीति-ज्योति से अन्यों को आलोकित करती है । इसलिये सहृदय लेखकों द्वारा अरुचिकर तत्त्वों को छोड़कर सांप्रतिक तथा आगामी समाज के लिये उपादेय तत्त्वों का परिवेषण करना चाहिये, जिससे भाषा और समाज सुप्रतिष्ठित हों । आधुनिक प्रगति के नाम पर अपसंस्कृति से जुड़ी दुर्गति कदापि काम्य नहीं है । प्रदूषक तत्त्वों का परिहार सर्वथा सराहनीय है ।

समीक्षा केवल दोष-दर्शन रूप आलोचना नहीं होनी चाहिए । केवल आधुनिक मुक्त-छन्द में लिखित साहित्य ही साहित्य–पद-वाच्य है और पूर्व सूरियों या सांप्रतिक सूरियों की पारम्परिक छन्दोबद्ध कविता साहित्य-पद-वाच्य नहीं – इस प्रकार सोचना नितान्त भ्रम है । अन्यान्य साहित्यों की भाँति संस्कृत में काव्य-रचना की दिशा में प्राचीन छन्दों या पारंपरिक छन्दों सहित मुक्त-छन्दों का सबल प्रयोग चल रहा है । मुक्त-छन्द में वर्ण और मात्रा के बन्धन न होने के कारण भाव-प्रकाशन में शब्दप्रयोग की स्वाधीनता रहती है । फिर मुक्त-छन्द भी लेखक की अपनी शैली से नये-नये प्रकार के बनाये जा सकते हैं । पारंपरिक छन्द और मुक्त-छन्द अपने अपने स्थान पर मर्यादा-सम्पन्न हैं । मनुष्य प्राचीनता से शिक्षा प्राप्त करके नूतनता में प्रवेश करता है, अतीत से ही वर्त्तमान को बनाता है और भविष्य की उज्ज्वल संभावना देखता है ।

प्राचीनता या परम्पराबद्धता या परम्परा का अनुसरण वास्तव में दोष नहीं ; उसे दोष-रूप में प्रस्तुत करना समीक्षक का दोष बन सकता है । लेखक अपनी रुचि के अनुसार लिखता है । आधुनिक साहित्यों में, विशेषकर संस्कृत साहित्य में, आजकल पारम्परिक भजन, स्तुति या भक्ति-परक काव्य-कविताएँ विविध शैलियों में लिखी जा रही हैं । ये भी जीवन के अंग-स्वरूप साहित्य के अंश-विशेष हैं । मुक्त-छन्द किसी एक भाषा का अपना तत्त्व नहीं है; वह प्राय हर भाषा-साहित्य में सुविधानुसार अपनी शैली में अपनाया गया है । आधुनिकता के नाम पर पुरातन रचनाओं के या पारंपरिक शैली में लिखित वर्त्तमान की रचनाओं के प्रति तुच्छ ज्ञान करना या अनादर भाव प्रदर्शन करना सुन्दर समीक्षा नहीं कही जा सकती । जिस प्रकार पारंपरिक छन्दों में रचित नूतन दृष्टिकोण-युक्त या नव्य-संवेदना-संपन्न उत्तम रचनाओं को पुरातन कहकर उनकी उपेक्षा करना समीचीन नहीं, उसी प्रकार मुक्त-छन्दों में प्रणीत नयी रचनाओं के प्रति प्राचीन छन्दों के समर्थकों द्वारा अनादर भाव पोषण भी उचित नहीं है ।

भारत के प्रान्तीय भाषा-साहित्यॊं में कई सुन्दर राग-रागिणियाँ और छन्द हैं । कुछ संस्कृत कवि सुविधानुसार उनमें से कुछ छन्दों को संस्कृत में अपनाकर उनका प्रयोग कर रहे हैं । उसी भाँति विदेशी भाषाओं के कुछ छन्दों को भी संस्कृत में अपनाकर उनका प्रयोग और परीक्षण किया जा रहा है । परन्तु उसी दृष्टि से ही अपने को आधुनिक कहलाना सत्य का अपलाप होगा । काया को विदेशी ढाँचे से आवृत किया जा सकता है, परन्तु आत्मा को नहीं । तथ्य तो यह है कि हर भाषा के साहित्य में मिश्रित छन्दों के प्रयोग से विविध कृतियाँ रची जा रही हैं । फिर भी शैली की दृष्टि से हर भाषा की स्वकीय विशेषताएँ हैं । आधुनिकता में नयी दृष्टिभगी होनी चाहिये; तभी लेखनी की सार्थकता बनती है । उसके साथ ही उपयुक्त समीक्षण साहित्य के लिये हितकारी है ।

प्रत्येक भाषा की अपनी निजस्व छन्दोयोजनाएँ और शैलियाँ हैं । उन्हें आधुनिकता के नाम पर कोई लेखक बदरंग बनाना चाहता है तो वह लेखक ही उसके प्रति उत्तरदायी रहता है । पुरातन हो या नूतन, यदि काव्यगुण सुरुचिपूर्ण, उपादेय, साहित्यिक मूल्यबोध-संपन्न और मनोहारी हो तो कविता कालजयी और चिरन्तन बन सकती है । कविकुलगुरु कालिदास ने ' मालविकाग्निमित्र '- नाटक में यथार्थ रूप से कहा है :-    

'पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
मूढ़ः पर-प्रत्यय-नेय-बुद्धिः ॥'
 (प्रस्तावना, १/२). 


कालिदास का कहना है : पुरातन होने के नाते सारे काव्य उत्कृष्ट हैं - ऐसी कोई बात नहीं और नूतन होने के नाते सब कुछ निकृष्ट है - ऐसी बात भी नहीं । विवेकी विज्ञ लोग पुरातन और नूतन वस्तुओं का अच्छी तरह अनुशीलन करके अपनी रुचि के अनुसार ग्रहण करते हैं । परन्तु मूढ़ व्यक्ति स्वयं यथार्थ रूप से परख नहीं पाता और दूसरों की बुद्धि से परिचालित होता है ।

प्रसंगानुसार ‘सहृदयानन्द’-महाकाव्य के प्रणेता कवि कृष्णानन्द की उक्ति यहाँ उल्लेखनीय है :-    

'प्रत्नस्य काव्यस्य च नूतनस्य
तुल्यः स्वभावः प्रतिभासते मे ।
मृजाभिरेते निपुणैः कृताभिः
समश्‍नुवाते हि गुणान्तराणि ॥'
 (१/५)
कवि का कहना है : मुझे पुरातन और नूतन - उभय काव्यों का स्वभाव समान प्रतीत होता है । ये दोनों प्रकार के काव्य प्रवीण विद्वानों द्वारा मार्जित अर्थात् संस्कारित होकर उत्कर्ष प्राप्त करते हैं ।

पुरातनता और परम्परा - इन दोनों का अटूट सम्बन्ध है; फिर परम्परा के साथ नूतनता का भी । उसी भाँति नूतनता और आधुनिकता - दोनों का परस्पर अभिन्न सम्पर्क है । हर युग में नूतन और पुरातन तत्त्वों का समन्वय होता रहता है । संस्कृत के मूर्धन्य काव्यकार कालिदास, भास, भारवि, माघ, श्रीहर्ष आदि कई सारस्वत साधक प्राचीन विषयों पर अपने अपने काव्य-सौध की भित्ति स्थापित करके मौलिक परिवेषण से यशस्वी बन चुके हैं । आधुनिक भाषा-साहित्यों में भी कई लेखक-लेखिकागण पुरातन विषयों पर लिखकर लोकप्रिय हुए हैं । इसलिये पुरातनता को कभी नकारा नहीं जा सकता । भारतीय परंपरा में पूर्व सूरियों के प्रति श्रद्धा सहित सम्मान-बोध रहा है । ‘रघुवंश’ में महाकवि कालिदास का कहना है :-    

'अथवा कृत-वाग्‌द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्व-सूरिभिः ।
मणौ वज्र-समुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ॥'
 (१/४) 


कवि कालिदास के कथन का तात्पर्य है : वाल्मीकि-प्रमुख पूर्वज मनीषियों ने रामाय़ण आदि ग्रन्थ रचकर सूर्य-सम्भूत वंश (रघुवंश) के बारे में वाणी का द्वार उन्मुक्त कर दिया है । सूची से बिद्ध मणि में सूत्र जैसे प्रवेश करता है, उसी प्रकार उसी वाणी-द्वार में प्रवेश कर मैं रघुवंश का वर्णन कर सकूँगा ।

कल्पना-विलास एवं वास्तविकता - ये दोनों विषय साहित्य के भित्ति-स्वरूप हैं । केवल आधुनिक विषयवस्तुओं को अपनाने से आधुनिकता नहीं बनती । समय था, संस्कृत-ओड़िआ आदि भाषाओं के साहित्यों में आलंकारिक युग मुख्य रूप से विदग्ध काव्य-पिपासु जनों का आमोद-दायक रहा । तत्कालीन कवि-लेखकों की कृतियाँ समय के विचार से उसी काल में "आधुनिक" कही जाती थीं । उसी समय का युग पाण्डित्य-प्रदर्शन का युग था । समयानुसार साहित्य-रुचि भी बदलती रहती । आजकल की आधुनिक और अत्याधुनिक काव्य-कविताओं में दुर्बोधता, भाव-पक्ष की जटिलता, रस-न्यूनता आदि सांप्रतिक-रुचि-सम्मत हो गई हैं । युग-रुचि के अनुसार साहित्य की सर्जना चलती रहती है । कवि-लेखक चाहें तो अपनी नवोन्मेष-शालिनी प्रतिभा से नयी दृष्टिभंगी लेकर एक नये युग का सूत्रपात कर सकते हैं । संस्कृत साहित्य में कालिदास के बाद 'किरातार्जुनीय'-महाकाव्य के रचयिता भारवि अपनी काव्य-रचना-शैली की स्वतन्त्र पहचान दिखाकर एक नव्य युग के प्रवर्त्तक बने ।

साम्प्रतिक अत्याधुनिक सभ्यता में सामाजिक-साहित्यिक आदि कई प्रकार की परिवर्त्तनशील रुचियों में व्यस्त मनुष्य पुरातन रुचि की उपेक्षा कर सकता है । परन्तु नूतन-पुरातन भेद-भाव के बिना, सुगुण-संपन्न कोई भी कृति सहृदय पाठक एवं समालोचक लोगों की आदर-भाजन बन सकती है । यह सच है कि हर कविता या कृति सार्थक नहीं होती । काव्य-प्रतिभा के विचार से , जिस किसी भाषा में भी लिखित सार्थक कृति केवल अतीत और वर्त्तमान काल में सीमित नहीं हो सकती; वह तो कालातीत, शाश्‍वत और अमर बन जाती है ।

किसी लेखक की कृति में वास्तव में जो दोष है, वह सब के लिये दोष-रूप में विवेचनीय है । परन्तु वास्तव गुण को अगर दोष-रूप में देखा जाये, तो उसमें खलत्व की संभावना रहती है । गुण-दोष-विचार के बारे में ओड़िआ-साहित्य के प्रकृति-कवि गंगाधर मेहेर की एक पंक्‍ति उल्लेखयोग्य है, जो 'तपस्विनी' काव्य से ली गयी है । कवि का कथन है :   

'न समझ गुणी का सद्‌गुण
जब कोई दोष देखने बन जाता निपुण,
उस दोषदर्शी की ऊँची स्थिति पर अपनी
होती विधि-कृत बड़ी बिड़म्बना भोगनी ॥' 
 (तपस्विनी, तृतीय सर्ग)

दुनिया में एक के लिए जो गुण है, दूसरे के लिये वह दोष बनाया जा सकता है, यदि दुर्जनत्व या विरोधी मनोभाव या असूया आदि उसमें प्रवेश करे । एक समीक्षक की दृष्टि से जो काव्य-तत्त्व गुण-रूप में प्रतिपादित है, अन्य समीक्षक की दृष्टि से उसी गुण को दोष रूप में वर्णित किया जा सकता है । परन्तु अच्छे-बुरे तत्त्वों के विवेचन करनेवाले सुधी पाठक-समुदाय ही वास्तव में उत्तम विचारक और समीक्षक हैं । समीक्षक केवल दोषदर्शी या छिद्र ढूँढनेवाला नहीं होना चाहिये; उसके पास सहृदय का उदार स्पर्श भी रहना चाहिये । अन्यथा, समीक्षक की अल्पज्ञता या मानसिक संकीर्णता प्रतिफलित हो सकती है । समीक्षक को सर्वथा निरपेक्ष बनना चाहिए और उपयुक्त रूप से गुण-दोष का अनुशीलन पूर्वक मन्तव्य देना चाहिए । नहीं तो, लेखक के दोष-दर्शन के बदले समीक्षक के दोष-दर्शन की आपत्ति आ सकती है, सहृदय पाठक-समाज की दृष्टि में । सर्जनात्मक समीक्षण सर्वथा स्वागतयोग्य और सराहनीय है, जिससे कवि-कृति को उत्कर्ष की ओर बढ़ने की विस्तृत दिशा प्राप्त होती है । समीक्षा में आधुनिकता के प्रसंग पर इच्छाकृत दोषान्वेषण सारस्वत प्रगति में बाधक बन सकता है । इसलिये पत्र-पत्रिकाओं में सारस्वत कृतियों का समीक्षण उत्तम रूप से होना चाहिये, जिससे प्रतिभा का निरपेक्ष समुचित मूल्यायन हो सके । उपसंहार में मेरा कहना है :-

'भुवि बाह्य-परिस्थित्या सुख-दुःखादि-योगतः ।
प्रच्छन्नाभ्यन्तरा शक्‍तिः प्रकाशते प्रवर्धते ॥'   

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Courtesy Main Source :
1. Article “ Ādhunikatā Evam Samīkshā / Kuchh Apnī Bāten”
By : Harekrishna Meher, Published in “Drik”, Vol.- 11, January-June 2004,
of Drig-Bharati, Jhusi, Allahabad, India.

Other sources :
1. "Sanskruta ebam Odia Sahityare Riti ; Eka Bihangavalokana" (Article)
By : Harekrishna Meher,
Published in " Akhyapāda”(Oriya Quarterly), January-March 1990, Cuttack, Orissa.

2. Tapasvini Kavya (Swabhavakavi Gangadhar Meher) /
Hindi Translation Book By : Dr. Harekrishna Meher.
Published by : Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, 2000.
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Thursday, May 28, 2009

Kumārasambhava Kavya (Canto-VII): Part-2 : Odia Version: Dr.Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-VII)    
Original Sanskrit Kāvya by : Mahākavi Kālidāsa
Oriya Metrical Translation by : Dr. Harekrishna Meher  

(Theme : Wedding Ceremony of Śiva-Pārvatī ) 
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Part -1: Link : 

http://hkmeher.blogspot.com/2009/05/kumarasambhavam-canto-vii-hkmeher.html  
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Kumārasambhava: Canto-VII : Oriya Version
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(Extracted from My Oriya Version of ‘Kumārasambhava – Saptama Sarga’ 

published in ‘Bartikā’, Puja Special Issue, October-December 2004, 
pp.996–1021, Dasarathapur, Jajpur, Orissa)  
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( Part – 2 )
कुमारसम्भव (सप्तम सर्ग) – शिव-पार्वती-परिणय
मूळ संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास 
ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेर 
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नगर-उपकण्ठरे नीळकण्ठ धीरे,
नभ-मार्गरु ओह्लाइ रहिले भूमिरे ।
त्रिपुरासुर-बिजय बेळरे सराग,
निज नाराचे चिह्नित थिला सेहि मार्ग ।
मुख टेकि उपरकु पुर-बासीगण,
निरेखिले पिनाकीङ्क शुभाबतरण ॥ (५१)
*
शिब-आगमे सानन्द भूधराधिराज,
बसाइ गज-राजिरे बान्धब समाज ।
स्वागत करिबा पाइँ गले शीघ्र चळि,
गज-य़ूथ देखि प्रते हो‍इला एभळि ।
गति करुअछि सते अद्रिपतिङ्कर ,
फुल्ल पुष्प-तरु-य़ुक्त कटक सुन्दर ॥ (५२)
*
हुअन्ते नगर-द्वार तहिँ उन्मुकत,
सुदूर-बिस्तारी बहु कोळाहळ-रत ।
देब-पक्ष गिरि-पक्ष बेनि बर्ग आसि,
एक सङ्गे मिशिगले उल्लास प्रकाशि ।
मध्य सेतु भङ्ग हेले दुइ पारुशर,
जळराशि य़था मिशि य़ाए परस्पर ॥ (५३)
*
त्रिलोक-पूजित हर करन्ते प्रणति,
लज्जित हेले अन्तरे तहिँ शैळपति ।
प्रथमरु निज मथा शिब-महिमारे,
नत थिलेहेँ जाणि न पारिले सेठारे ॥ (५४)
*
आनन्दे प्रफुल्ल-मुख पर्बत-सम्राट,
जामाताङ्क अग्रे चळि देखाइले बाट ।
अगणित पुष्पराशि बिपणीर मार्गे,
गुल्फ परिय़न्ते ब्याप्त थिला अनुरागे ।
परबेश कराइले शिबङ्कु सुमने,
मणि-मुकुता-समृद्ध नगर-भबने ॥ (५५)
* * *
महेश-दर्शन आशे रमणी सकळ,
मधुगन्ध-सुबदन टेकिले चञ्चळ ।
नयन-भृङ्ग-मण्डित मुखे बिलोकन्ते,
सहस्र दळे शोभिला बातायन सते ॥ (६२)
*
पताका-तोरण माळे सुन्दर सुसज्ज,
राजमार्गे पहञ्चिले य़ाइ बृषध्वज ।
दिबसरे मध्य शिर- चन्द्र-कर बाजि,
द्विगुण शोभा बहिला शुभ्र सौधराजि ॥ (६३)
*
अपलक नेत्र-य़ुगे शिबे करि लय,
नारीगण बिस्मरिले अपर बिषय ।
सेमानङ्कर इन्द्रिय- ब्यापार समस्त,
नयन-य़ुगळे सते हेला समागत ॥ (६४)
*
“सुकुमाराङ्गी पार्बती ए बर निमित्त,
दुस्तर तप साधिले, ताहा समुचित ।
धन्या से त य़े शिबङ्क सेबिका हो‍इब,
ता सौभाग्य कि बर्ण्णिबा अङ्के य़े शो‍इब ॥ (६५)
*
परस्पर शोभाकर पार्बती-शङ्कर,
परिणय न हुअन्ता य़दि दुहिँङ्कर ।
गढ़िला य़े प्रजापति ए रूप य़ुगळ,
सर्ब परिश्रम तार हुअन्ता बिफळ ॥ (६६)
*
दहिले कामदेबकु शङ्कर क्रोधित,
मो बिचारे ए बचन नुहे समुचित ।
शिब-शोभा देखि लज्जा- बशे पञ्चशर,
निजे एका भस्म कला निज कळेबर ॥ (६७)
*
सखि ! आम्भ गिरिराज शिबङ्क बाञ्छित,
सम्बन्ध सौभाग्य बळे लभिले निश्‍चित ।
धरा-धारणे उन्नत शिरकु निजर,
चिरकाळ उच्चतर करिबे एथर ॥“ (६८)
*
ए ऋपे ओषधिप्रस्थ- नगर-बासिनी,
रमणीगणङ्क मुखुँ श्रुति-उल्लासिनी –
कथामान शुणि शुणि प्रभु त्रिलोचन,
पहञ्चिले मोदभरे हिमाद्रि-भबन ।
आचार मते प्रचुर क्षिप्त लाजा-राजि,
चूर्ण्ण हेउथिला तहिँ बाहु-बन्धे बाजि ॥ (६९)
*
बिष्णुङ्कर कर धरि शशाङ्क-भूषण,
अबतरिले बृषभ- पृष्ठरु तक्षण ।
शारदीय बळाहक- पृष्ठरु य़ेभळि,
अबतरण करन्ति देब अंशुमाळी ।
प्रबेशिले शिब गिरि- सदन- कक्षरे,
प्रथमरु ब्रह्मा तहिँ थिले आसनरे ॥ (७०)
*
प्रशस्त कार्य़्य आरम्भ हेले य़ेप्रकार,
सुफळ अनुगमन कर‍इ ताहार ।
सेहिपरि मघबादि देबता-निकर,
सप्तर्षि-प्रमुख महाऋषिए आबर ।
गण-माने शिबङ्कर पछे पछे थाइ,
श‍इळ-सदन मध्ये प्रबेशिले य़ाइ ॥ (७१)
*
गिरिश आसने बसि हिमाळय-दत्त,
मधु-य़ुक्त गब्य, अर्घ्य रतन समस्त ।
सङ्गे नब पट्ट बस्त्र य़ुगळ सेठारे,
ग्रहण कले समन्त्र- बिधि अनुसारे ॥ (७२)
*
दुकूळ-शोभी शिबङ्कु अन्तःपुर जने,
उमा पाशे सबिनय नेले हृष्ट मने ।
इन्दु-रश्मि-राशि य़था फेन-पुञ्ज-भर,
अम्बुधिकि बेळा पाशे निअ‍इ सादर ॥ (७३)
*
उल्लसे बिश्व भुबन शरदागमने,
पार्बतीङ्क मुख-चन्द्र- कान्तिरे तेसने ।
त्र्यम्बक-नेत्र-कुमुद मुदकु भजिला,
चित्त-नीर निरिमळ रूपे बिराजिला ॥ (७४)
*
सेकाळे चन्द्रशेखर गिरि-जेमाङ्कर,
नयन-य़ुग चञ्चळ भाबे परस्पर ।
मिळि किछि क्षण पुणि हेउथिले भिन्न,
लज्जा-अभिभूत हेले बहि प्रेम-चिह्न ॥ (७५)
*
गिरि-गुरु गौरीङ्कर ताम्राङ्गुळि कर,
बढाइबारु ग्रहण कले महेश्वर ।
शोभिला से हस्त शिब- भये उमा-काये,
गुप्त कामदेबङ्कर आद्याङ्कुर प्राये ॥ (७६)
*
रोमाञ्च हेला सेकाळे पार्बती-शरीरे,
स्वेद जन्मिला शिबङ्क अङ्गुळि-राजिरे ।
मदन-ब्यापार पाणि- मिळन हुअन्ते,
बेनि जन ठारे सम भाग हेला सते ॥ (७७)
*
बिबाहे सान्निध्य लभि शिब-उमाङ्कर,
बढ़‍इ शोभा सामान्य बर-कन्याङ्कर ।
उभा य़हिँ बर-कन्या स्वयं शिब- शिबा,
ताङ्क दिब्य शोभा आउ कि बर्ण्णि पारिबा ? ॥(७८)
*
प्रज्वळित दीप्तानळ प्रदक्षिण करि,
उमा सङ्गे गङ्गाधर शोभिले एपरि ।
मेरु-प्रान्त भागे सते मिळि परस्पर,
परिक्रमा करुछन्ति रजनी बासर ॥ (७९)
*
परस्पर स्परशरे नेत्र हेला बुजि,
पुरोहित शिब-उमा आगे अग्नि पूजि ।
प्रदक्षिण तिनि बार तोषे कराइले,
शैळजा-हस्तरे लाजा- होम सम्पादिले ॥ (८०)
*
सुगन्धित लाजा-धूम कराञ्जळि करि,
मुखे घेनिले पुरोधा- बचने सुन्दरी ।
से धूम भ्रमि ताङ्करि कपोळ उपरे,
मुहूर्त्ते शोभिला कर्ण्ण- भूषण रूपरे ॥ (८१)
*
लाजा-धूम निज मुखे ग्रहण कलारु,
लोहित स्वेदाक्त हेला कपोळ सुचारु ।
लम्बिला कृष्ण कज्जळ नयन-य़ुगरे,
य़बाङ्कुर मळिनता भजिला कर्ण्णरे ॥ (८२)
*
पुरोधा बो‍इले, “बत्से ! एहि बैश्वानर,
करम-साक्षी अटन्ति तुम्भ बिबाहर ।
स्वामी शङ्कर सङ्गरे शङ्का परिहरि,
बिधिमते धर्म-कृत्य थिब गो आचरि ॥“ (८३)
*
आदरे डेरि आनेत्र- बिस्तृत श्रबण,
पुरोधा-बचन उमा करिले ग्रहण ।
आतप काळे उत्तप्ता क्षिति य़ेरूपरे,
आद्य मेघ जळबिन्दु घेने समादरे ॥ (८४)
*
ध्रुब-दरशन लागि पतिङ्क आज्ञारे,
बदन टेकिले निज शैळजा लज्जारे ।
धीरे चारु बिम्बाधरी मधुर बचन,
बो‍इले शङ्कर आगे, “कलि दरशन” ॥ (८५)
*
बिश्व-पिताङ्कर बिश्व-माताङ्क सहित,
बिभा सम्पादिले बिधि- बेत्ता पुरोहित ।
पद्मासने बिराजित ब्रह्माङ्क पादरे,
बर-बधू प्रणिपात कले समादरे ॥ (८६)
*
आशिष देले स्वयंभू पार्बतीङ्कि शुभे,
“आगो सुकल्याणि ! बीर-प्रसू हुअ तुम्भे ।“
कि आशिष देबे तहिँ ईश्वरङ्क प्रति,
चिन्ति न पारिले से त हेलेहेँ बाक्‍पति ॥ ((८७)
*
तहुँ पुष्प-शोभी चतुरस्र बेदी परे,
स्वर्ण्ण पीठे बर-कन्या बसिले मोदरे ।
लोकाचार मते निज देहे बिच्छुरित,
आर्द्राक्षत अनुभब करिले तुरित ॥ (८८)
*
पत्र-धारे लग्न जळबिन्दु-मुक्ता-य़ुत,
दीर्घ नाळ दण्ड य़ोगे बिमण्डित पूत ।
श्वेत पद्म-छत्र धरि लक्ष्मी निज करे,
शिब-शिबाङ्कर शिरे मण्डिले तोषरे ॥ (८९)
*
बेनि-रूपा बाणी य़ोगे देबी सरस्वती,
बन्दिले से दम्पतिङ्कि परसन्न-मति ।
ईश्वरङ्कु स्तुति कले बिशुद्ध संस्कृते,
उमाङ्कु सुबोध-पद- बिन्यास प्राकृते ॥ (९०)
*
पञ्चसन्धि मध्ये बृत्ति- भेदरे ब्यञ्जित,
शृङ्गारादि रस य़ोगे मधुरागान्वित ।
परिपाटी-भरा नाट्य अपसराङ्कर,
प्रेमे निरेखिले क्षणे ग‍उरी- शङ्कर ॥ (९१)
*
मुकुट-बद्धाञ्जळिरे प्रणमि अमरे,
सपत्‍नीक पिनाकीङ्कु बन्दिले आदरे ।
शाप अन्ते देहधारी कामदेबङ्कर,
सेबा निमन्ते प्रार्थना करिले आबर ॥ (९२)
*
प्रसन्न मानसे तहिँ शिब निज ठारे,
अनुमति प्रदानिले मदन- ब्यापारे ।
प्रभुङ्क समीपे उपय़ुक्त अबसरे,
प्रार्थना कले सफळ हुए निश्चितरे ॥ (९३)
*
सुरगणङ्कु बिदाय देइ शूळधारी,
आपणार हस्ते धरि प्रिया सुकुमारी ।
भव्य कौतुक-भबने हेले उपस्थित,
भूमिपरे चारु शय़्या थिला सुसज्जित ।
सुबर्ण्ण कळश-श्रेणी पाउथिला शोभा,
रम्य चित्रमान तहिँ थिला मन-लोभा ॥ (९४)
*
नब-परिणय-बेशे नगेश-दुलणा,
मथा पोति रहिले से लज्जा-आभरणा ।
शिब स्वहस्ते टेकन्ते से नत बदन,
लाजे लुचाइले गौरी बुलाइ बहन ।
शय़्या-सखी पचारिले उत्तर ताहार,
क‍उणसि मते देले बहि लज्जा-भार ।
प्रमथ-गणङ्क मुख-भङ्गी माध्यमरे,
हास्य जन्माइले शम्भु शुभाङ्गी-अन्तरे ॥ (९५)
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( Kumārasambhava Canto-VII of Harekrishna Meher Complete. )
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Related Link: 
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Kumāra-Sambhava Kāvya (Canto-VII): Odia Version:
http://hkmeher.blogspot.in/2016/10/kumara-sambhava-kavya-canto-vii-odia.html 
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Kumārasambhava Kavya (Canto-VII) Part-1 : Odia Version: Dr.Harekrishna Meher

Kumāra-Sambhava (Canto-VII)
Original Sanskrit Kāvya by : Mahākavi Kālidāsa
Oriya Metrical Translation by : Dr. Harekrishna Meher 

(Theme : Wedding Ceremony of Śiva-Pārvatī )   
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Introduction :  
Kumārasambhava enjoys a prominent position among the five great epics of Classical Sanskrit Literature. The word ’Kumāra’ means ‘Kārttikeya’ and ‘Sambhava’ means ‘Birth’. This kāvya contains 17 cantos and treats of the birth of Kārttikeya, the son of God Śiva and Pārvatī. Some critics opine that the first eight cantos are the original writing of Poet Kālidāsa and the rest cantos are spurious. But this opinion does not seem appropriate; because the main theme of this kāvya is ‘birth of Kumāra’ and hence it has been named ‘Kumāra-Sambhava’. Kārttikeya’s birth is described in Canto-X, while Marriage of Śiva-Pārvatī is depicted in Canto-VII and the union of the couple in Canto-VIII and IX. Birth of Kumāra is meant for killing of the demon-king Tāraka. So the remaining cantos after Canto-VIII do bear significance for completion of the main theme.

Tortured by Tārakāsura, all the gods prays before Brahmā, the Creator God, for the solution. Brahmā tells that Kumāra, the son of Śiva-Pārvatī would slay the demon Tāraka and protect the heaven. Advised by Brahmā, the gods make necessary arrangements to attract Śiva’s mind towards princess Pārvatī. Contextually Pārvatī by her severe penance becomes able to propitiate Mahāyogī Śiva for marriage with herself.

Canto-VII, bearing 95 verses, deals with the topic of Śiva-Pārvatī’s marriage ceremony. Lord Śiva weds princess Pārvatī, the daughter of the mountain-king Himālaya and Queen Menā. In accordance with social customs, from Śiva’s side, Saptarshi, the seven rishis place before Himālaya, the proposal of his daughter Pārvatī’s marriage with Śiva. After heartiest consent given by bride’s parents, the wedding is accomplished with much pomp and ceremony in the royal palace of Oshadhiprastha city, the residence of the mountain-king.

Just before marriage, decorations with ornaments and costume-design of princess Pārvatī are performed as per social and traditional customs, as seen in human society. Brahmā, Vishņu, Lakshmī, Sarasvatī and all the gods headed by Indra with enthusiastic and hilarious hearts, attend the wedding celebration. The priest performs the marriage function with Vedic rituals. Goddess Lakshmī holds white lotus-umbrella above the heads of the bride and groom. Sarasvatī, the Goddess of Speech and Learning, congratulates the couple with bilingual greetings ; she offers homage to Śiva in Sanskrit language and to Pārvatī in delicate Prākrit language. All other gods heartily extend their salutations and prayers to the newly-wed couple.

Poet Kālidāsa says :
“In the general weddings in human society, beauty of the bride and the bride-groom becomes enhanced by remembering and worshipping the auspicious God-couple Śiva-Pārvatī . When Lord Śiva himself as bride-groom and Pārvatī as bride are wedding, the divine beauty of the father-mother of the world is really indescribable.” (Kumāra. 7/78)
* *


Kumārasambhava’s Canto-VII : Odia Version : 
Part-1 :    
*
(Extracted from My Oriya Version of ‘Kumārasambhava – Saptama Sarga’
published in ‘Bartikā’, Puja Special Issue, October-December 2004, pp.996 – 1021, 
Dasarathapur, Jajpur, Orissa)
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कुमारसम्भव (सप्तम सर्ग)  *  शिव-पार्वती-परिणय * 
मूळ संस्कृत काव्य : महाकवि कालिदास

ओड़िआ पद्यानुवाद : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेर   

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तृतीय दिबस अन्ते शुकळ पक्षरे,
शुभ तिथिरे लग्नरु सप्तम स्थानरे ।
शङ्कर सङ्गे बिबाह- बिधि उमाङ्कर,
आयोजिले बन्धुबर्गे निमन्त्रि भूधर ॥ (१)
*
प्रतिगृहे प्रीतिबशे मङ्गळ तोरण,
पताका आदि शोभिला आड़म्बरे पूर्ण्ण ।
उत्सबे मज्जि रहिले गृहिणी समस्त,
नगेन्द्र-नगर हेला बिभा-कार्य़्य ब्यस्त ।
पुर-अन्तःपुर भेद न थिला सेठारे,
मने हेला सर्बे जात एक परिबारे ॥ (२)
*
कल्पपुष्प राजपथे हो‍इला बिञ्चित,
चीन-बस्त्र ध्वजामान उड़िला अमित ।
कनक तोरणराजि प्रभा बिकाशिला,
चतुर्दिग समुज्ज्वळ सेकाळे दिशिला ।
ओषधिप्रस्थ नगर हो‍इला प्रतीत,
स्थानान्तरे स्वर्ग किबा दिशे सुशोभित ॥ (३)
*
पुत्र अनेक थिलेहेँ एक‍इ दुहिता,
शीघ्र चालिय़िब एबे हो‍इ बिबाहिता ।
निरेखिले पिता-माता तेणु समादरे,
सते ताङ्कु देखुछन्ति बहु काळ परे ।
मृत कन्या पुणि प्राण पाइ सते फेरि,
आसिछि, ए रूपे दुहेँ लक्ष्य कले हेरि ॥ (४)
*
कुटुम्बीए ताङ्कु निज अङ्के बसाइले,
शुभाशिष देइ बहु भूषणे मण्डिले ।
भिन्न सम्बन्ध हेलेहेँ भूधरेश-कुळ –
स्नेह सर्ब सुताठारे आसि हेला ठुळ ॥ (५)
*
मिहिर उदय परे तृतीय क्षणरे,
चन्द्र सङ्गते उत्तरा- फाल्‌गुनी य़ोगरे ।
पति-पुत्रबती साध्वी बन्धु-नारीगण,
बिरचिले उमा-अङ्गे शृङ्गार भूषण ॥ (६)
*
स्नान-य़ोग्य पट्ट बस्त्र पिन्धिले तरुणी,
श्वेत सोरिष- मिश्रित मृदु दूर्बा पुणि ।
माङ्गळिक बिधि-शर घेनिले सङ्गरे,
मानस मोहिले उमा स्नान-सुबेशरे ॥ (७)
*
तहिँ मङ्गळ बिबाह-संस्कारे ग‌उरी,
शायक सम्बन्ध लभि शोभिले आहुरि ।
कृष्ण पक्ष अन्ते रबि- तेजे समुज्ज्वळा,
सुन्दर दिश‍इ य़था तन्वी चन्द्रकळा ॥ (८)
*
लोध्र-रजे तनु-तैळ शुष्क कले सर्ब,
शरीरे लेपन कले सुगन्ध दरब ।
लाबण्यमयीङ्कु तहुँ रमणी-निचय,
उत्तम बस्त्र पिन्धाइ नेले स्नानाळय ॥ (९)
*
मुक्ता-तोरण-चित्रित चारु मण्डपरे,
मरकत-बिरचित शिळातळ परे ।
हैमबतीङ्कि बसाइ हेम-कुम्भ-नीरे,
तूर्य़्य-नाद साथे स्नान कराइले धीरे ॥ (१०)
*
माङ्गळिक स्नान अन्ते शुद्ध-तनु पूता,
शोभिले शुभ बिबाह- बस्त्रे अद्रि-सुता ।
मेघ-जळे अभिषिक्ता हो‍इ य़ेउँरूपे,
धरणी शोभे शरदे स्वच्छ काश-पुष्पे ॥ (११)
*
पतिब्रताए उमाङ्कु नेले स्नानागारु,
चतुर्मणि-स्तम्भय़ुक्त चन्द्रातप चारु -
अळङ्कार-गृहे माङ्गळिक बेदिकारे,
सज्जित आसन थिला बेश रचिबारे ॥ (१२)
*
मोदे बसाइले पार्बतीङ्कि पूर्ब मुखे,
तनु-सज्जा पाइँ निजे बसिले सम्मुखे ।
तहिँ प्रसाधन उपकरण बहुत,
थिलेहेँ निज समीपे सज्जित प्रस्तुत ।
नारीए निसर्ग-शोभा करन्ते ईक्षण,
बेश-कर्म बिळम्बित हेला किछि क्षण ॥ (१३)
*
केउँ नारी धूप दीप देइ ताङ्क पाश,
धीरे शुष्क कला रम्य आर्द्र केशपाश ।
खञ्जिला मञ्जु कुसुम, बान्धिला मधुर –
मधुक सुमन-माळा सङ्गे दूर्बाङ्कुर ॥ (१४)
*
गौरी-कळेबरे गोरचना चिता सङ्गे,
श्वेत अगुरु लेपिले नारीए कि रङ्गे ।
रथाङ्ग-चिह्नित चारु- पुळिना जाह्नबी–
कान्तिकि जिणिला तहिँ उमा-तनु-छबि ॥ (१५)
*
मेना-सुताङ्क कुन्तळ-कळित बदन,
अळि-सेबित नळिने करिला निन्दन ।
अम्बुद-बेष्टित चन्द्र- बिम्बकु आबर,
अपसारि न रखिला बिश्वे पटान्तर ॥ (१६)
*
लोध्र-पुष्परेणु-बोळा गण्ड शुष्क थिला,
गोरोचना-प्रलेपने उज्ज्वळ दिशिला ।
श्रबणे खचित य़बाङ्कुर बिभूषण,
गण्डे लम्बि कला जन- नेत्र आकर्षण ॥ (१७)
*
मध्य रेखारे बिभक्त ओष्ठ पार्बतीङ्क,
मधु-लेप य़ोगे हेला सराग अधिक ।
बहिला अपूर्ब छबि स्फुरि बारम्बार,
निकटे लाबण्य-फळ प्राप्ति हेब तार ॥ (१८)
*
उमा-पाद रञ्जि सखी आशिषिला हसि,
“स्परश कर ए पदे पति-शिर-शशी ।“
सेहि परिहास- गिर शुणि गौरी धीरे,
मौने माल्य प्रहारिले सखीर शरीरे ॥ (१९)
*
बेश-रचना-कारिणी प्रबीणा बामाए,
गिरिजाङ्क कृष्ण दीर्घ नीळ कञ्ज प्राये –
नेत्र चाहिँ शोभा अर्थे न करि रञ्जन,
मात्र मङ्गळ बिधिरे रञ्जिले अञ्जन ॥ (२०)
*
य़था नब पुष्पपुञ्जे मञ्जुळ बल्लरी,
ज्योतिर्मय ऋक्षे य़था शोभे बिभाबरी ।
बिहङ्ग-आगमे शोभे तरङ्‌गिणी य़था,
शुभ आभरणे उमा बिराजिले तथा ॥ (२१)
*
स्थिर नेत्रे आपणार रूपकु दर्पणे,
देखि उमा स्वामी-लाभे ब्यग्र हेले क्षणे ।
अङ्गनागण-रचित शृङ्गार सकळ,
प्रियतम-दरशने हुअ‍इ सफळ ॥ (२२)
*
अङ्गुळि-य़ुगळे निज आर्द्र हरिताळ,
मनःशिळा चूर्ण्ण य़ोगे घेनि ततकाळ ।
कन्यार कर्ण्ण-भूषण - शोभित मुखकु,
नगाधिराज-गृहिणी टेकिले ऊर्द्ध्वकु ॥ (२३)
*
मङ्गळ तिळक लगाइले मस्तकरे,
ताङ्क मनोरथ सिद्ध हेला ए काळरे ।
जननी निज कन्यार प्रथम य़ौबने,
दीक्षा-तिळकर कथा भाबिथिले मने ॥ (२४)
*
पूर्ण्ण हेला माता-नेत्र हर्ष-लोतकरे,
ऊर्ण्णमय बिभा-सूत्र निज पुत्री-करे ।
अन्य स्थाने बान्धिबारु मङ्गळ बिधाने,
अङ्गुळिरे घुञ्चाइला धात्री य़थास्थाने ॥ (२५)
*
पट्ट बस्त्र पिन्धि नब दर्पण सङ्गते,
पर्बतराज-तनुजा शोभिले एमन्ते ।
फेनपुञ्ज य़ोगे क्षीर- सिन्धु-बेळा परि,
पूर्ण्ण चन्द्र घेनि य़था शारद शर्बरी ॥ (२६)
*
परिणय-रीति-दक्षा मेना स्वकुळर,
य़शोबर्द्धिनी दुहिता उमाङ्कु तत्पर ।
प्रणमाइ कुळ-देब अग्रते सहर्ष,
पतिब्रताङ्क चरणे कराइले स्पर्श ॥ (२७)
*
नम्रा उमाङ्कु सतीए देले आशीर्बाणी,
“स्वामीङ्क अखण्ड प्रेम लभ हे कल्याणि ! "
शिबङ्क अर्द्धाङ्ग-प्राप्त उमाङ्क निमन्ते,
आत्मीयङ्क आशीर्बाद हेला न्यून प्रते ॥ (२८)
*
उत्साह ऐश्वर्य़्य सह समारोहे भारि,
सुता बिबाह पूर्बरु स्वकर्त्तब्य सारि ।
सभा मध्ये उपबेशि बन्धुङ्क समीप,
शिबागम अपेक्षारे रहिले अद्रिप ॥ (२९)
*
सेहिकाळे क‍इळासे आदर सहित,
सपत माता प्रथम बिबाह-उचित ।
मङ्गळ बाचन लागि बस्त्र भूषणादि,
त्रिपुरारिङ्क पुरते रखिले सम्पादि ॥ (३०)
*
माताङ्क गौरब अर्थे भूषण सकळ,
न घेनि शङ्कर स्पर्श करिले केबळ ।
महामहिम शिबङ्क कपाळ प्रभृति,
बिबाह- बेशरे हेला रम्य अळङ्कृति ॥ (३१)
*
श्वेत अङ्गराग हेला चिता भस्म-जाळ,
मस्तक-भूषण हेला मञ्जुळ कपाळ ।
शोभा पाइला प्रभुङ्क देहे गज-चर्म,
प्रान्त-भाग-सुचित्रित बस्त्र मनोरम ॥ (३२)
*
ललाट देशे ताङ्करि दीप्त सुशोभन,
पीत –कनीनिका-य़ुक्त तृतीय नयन ।
निज तेज परकाशि हरिताळ- कृत –
पबित्र तिळक रूपे कला अळङ्कृत ॥ (३३)
*
शिब-अङ्गे य़थास्थाने भुजङ्गम-गण,
नाना बिभूषण रूपे शोभिले सेक्षण ।
केबळ तनुरे परिबर्त्तन हो‍इला,
फणा-रत्‍न-कान्ति पूर्ब परि दीप्त थिला ॥ (३४)
*
दिबसे मध्य बिशद दीप्त निष्कळङ्क,
एक-कळात्मक चन्द्र नीळलोहितङ्क ।
चूड़ामणि स्थाने बिराजिला चमत्कार,
आबश्यक न हो‍इला अन्य अळङ्कार ॥ (३५}
* *
नन्दी-भुजे हस्त थापि ब्याघ्र-चर्माबृत,
बृषभ-पृष्ठे आरूढ़ हेले शूळभृत ।
शिब-भक्ति घेनि सते कैळास आपणे,
बृष रूपे लघु काय कला सेहिक्षणे ॥ (३७)
* *
सुबर्ण्ण-रुचिरा मातृ-गणङ्क पछरे,
बिराजिले कपाळिनी काळी ए रूपरे ।
बळाका-शोभिता य़था नीळ कादम्बिनी,
सम्मुखे स्फुरित य़ार दीप्त सौदामिनी ॥ (३९)
* *
बिश्वकर्मा-कृत नब छत्र बिकर्त्तन,
ब्योमकेश-शिरे धरि कले बिमण्डन ।
छत्रर पट्ट-बस्त्रटि शिर पाशे जड़ि,
प्रते हेला, सते गङ्गा- धार अछि पड़ि ॥ (४१)
*
से समये मन्दाकिनी य़मुना ए बेनि,
चामर बिञ्चिले शिबे चारु तनु घेनि ।
तटिनी स्वरूप तेजि थिलेहेँ निजरि,
शोभिले चामर य़ोगे हंस-य़ुक्ता परि ॥ (४२)
*
आदि ब्रह्मा सङ्गे बिष्णु श्रीबत्स-भूषण,
शिबङ्कर जय ध्वनि कले उच्चारण ।
बेनि प्रभु कले शम्भु- महिमा बिस्तार,
घृत-हबनरे बह्नि बढ़े य़े प्रकार ॥ (४३)
*
एक मूरति बिभक्त तिनि स्वरूपरे,
सृष्टि-पाळन-प्रळय- हेतु ब्रह्माण्डरे ।
पद्मनाभुँ केबे बड़ हुअन्ति महेश,
महेश ठारु केबे त बड़ हृषीकेश ।
परमेष्ठी केबे बड़ बेनि देबतारु,
बिष्णु महादेब केबे बड़ ब्रह्मा ठारु ॥ (४४)
*
इन्द्रादि दिगीश तेजि राज-चिह्नमान,
शिब-दरशन इच्छि अ‍इले से स्थान ।
इङ्गिते नन्दी दर्शन कराइले परे,
कर य़ोड़ि प्रणमिले समस्त अमरे ॥ (४५)
*
शिर चाळि शिब कले ब्रह्मारे आदर,
शिरीपतिङ्कि कुशळ पुच्छि महेश्वर ।
शतमन्युङ्कु सम्मान कले शुचि स्मिते,
अन्य देबतागणङ्कु निरेखि सुचित्ते ॥ (४६)
*
आशिषिले जय-शब्दे सप्त ऋषिबर,
बदने स्मित बिकाशि बो‍इले ईश्वर ,
“पूर्बरु मुँ बरिछि ए बिबाह-य़ज्ञरे,
आपणमानङ्कु प्रिय ऋत्विज रूपरे ॥" (४७)
*
बिकार-बर्जित प्रभु मृगाङ्क-शेखर,
पथ बाहिगले, तहिँ गन्धर्ब किन्नर –
बिश्वाबसु आदि बीणा बाइ तोषमन,
कले त्रिपुर-दहन महिमा गायन ॥ (४८)
* *
ओषधिप्रस्थ नगर नगराजङ्कर,
अपराजेय से पुर अराति-गणर ।
सुरक्षित से नगरे क्षणक मध्यरे,
पहञ्चिला महाबळी बृष आनन्दरे ।
ईशानङ्कर कटाक्ष – स्वर्ण्णसूत्र सते,
अग्रे आकर्षि ताहाकु घेनिगला द्रुते ॥ (५०)
* * *


(Continued) * * * 

Part- 2 : 
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Related Link : 
Kumāra-Sambhava Kāvya (Canto-VII): Odia Version:
http://hkmeher.blogspot.in/2016/10/kumara-sambhava-kavya-canto-vii-odia.html 
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Wednesday, May 27, 2009

Oriya Poem ‘Surabhita Pushpa Prati’ (सुरभित पुष्प प्रति): Dr. Harekrishna Meher

Oriya Poem 'Surabhita Pushpa Prati ' 
(To the Fragrant Flower) 

By : Dr. Harekrishna Meher
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(For convenience of general readers,
Oriya letters have been shown here in Devanagari script)

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सुरभित पुष्प प्रति
(ओड़िआ कविता)   
* रचना : डक्टर् हरेकृष्ण मेहेर 
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अनुराग-भरा मुग्ध नयने
थरे तोते देले चाहिँ रे,
अन्तरे य़ेउँ हरष जनमे
पटान्तर ता नाहिँ रे ॥ (१)
*
क्षण-भङ्गुर सकळ बस्तु
बोलि तु शिक्षा बितरु,
बुझिबे मानबे संशय तेजि
आपणा चित्त भितरु ॥ (२)
*
बहु काळ य़ाए निर्गुण हो‍इ
बञ्चिबा अटे बिफळ,
क्षणक सुद्धा सुगुण थिले त
बिकशे कीर्त्ति बिमळ ॥ (३)
*
समय-कबळे सबु लाबण्य
ढळिब अङ्गुँ तोहरि,
माधुर्य़्य आउ न थिबटि आहा !
थिला ता पूर्बे य़ेपरि ॥ (४)
*
चिरदिन लागि तिष्ठि पारे कि
तुच्छ बड़िमा गरब ?
सम्पद-मदे अन्तिम काळे
शिरीहीन हुए सरब ॥ (५)
*
दुनिआकु देउ क्षणक हेले बि
सुबासित गुण तोहरि,
सहृदय-मन पुलकि उठ‍इ
रसमय भाबे बिहरि ॥ (६)
*
तोहरि कोमळ सुन्दर-पणे
नाहिँ तिळे छळ कपट,
पर-उपकारे परमेश्‍वर -
सृष्टि हो‍इछि प्रकट ॥ (७)
*
बिबेकी बुझ‍इ तोर महत्त्व
परकाशे निज आदर,
खळ जन सिना निन्दे ए भबे
न सहि बित्त परर ॥ (८)
*
धरा-उद्याने तो चारु शुभ्र
छबिरे मुग्ध मरम,
भाबुक कबि त लेखनी चळाए
पाइ उल्लास परम ॥ (९)
*
मोहुछि रुचिर दिब्य छबि तो
जगते सर्ब जीबन,
तोर मधुरिमा झराउ निरते
पीयूष बिन्दु पाबन ॥ (१०)
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Written on Date 5-10-1985.
(Published in “Bindu”, November 1985, 
Upanta Sahitya Sansad, Badbil, Keunjhar.
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Revised Published in ‘Chaiti Chadhei', 
October-December 2003, Jaipatna, Orissa)
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Oriya Poem ‘Maņisha O Kāļa’ / H.K.Meher

Oriya Poem ‘Maņisha O Kāļa’ (Man and Time)
By : Dr. Harekrishna Meher

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( For convenience of general readers,
Oriya letters have been shown here in Devanagari script)

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मणिष ओ काळ (ओड़िआ कविता)
रचना : डक्टर् हरेकृष्ण मेहेर

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मणिष कहे :
" बञ्चि रहिथिबि एहि पृथिबीरे
य़ेतेक दिबस,
चरितार्थ करिबि मो जीबनर
मधुमय रस ।
असाध्य पार‍इँ साधि हेले मध्य
अबाध्य मुँ आजि,
निबारिबि दुर्निबार दुःख दैन्य़
बिभीषिका-राजि ॥

अशेष जगते शेष रहिअछि
मरण बरण,
तथापि करिबि मोर शक्तिमते
ज्ञान आहरण ।
मानब मो नब नब बस्तु परे
रहिछि बिश्‍वास,
लङ्‌घिबि अलङ्‍घ्य दुर्ग तेबे य़ाइ
लभिबि आश्‍वास ॥"

काळ कहे :
“स्रष्टाङ्क बिचित्र सृष्टि
अद्‌भुत ए धरणी सुन्दर,
उद्धत न हो‍इ य़ोद्धा
कर्म-मार्गे हुअ अग्रसर ।
निज सुकर्म दुष्कर्म
फळ पाइँ तुहि एका दायी,
सुकीर्त्ति अरज मर्त्त्ये
सत्य धर्म न्याय पन्था ध्यायि ॥

बिश्‍व-प्रीति भाबे तोर
प्रेममय स्वरग ए मही,
पुणि तोर अत्याचारे
नरकर स्रोत य़ाए बहि ।
स्वकरे सर्जुछु केते
ध्वंसकारी नानाबिध ब्याधि,
आपणार जिह्वा छेदि
रचुअछु अकाळ समाधि ॥

निज बश करिपारु
अबश्य तु ए बिश्‍व संसार,
बर-जीब मानबर
सर्बधर्मे कर्म एका सार ।
पृष्ठा पृष्ठा लेखुथिबु
केते केते नब्य इतिहास,
दृष्टान्त केते अधर्म
धर्म य़ुद्ध शान्ति अश्रु हास ॥

आध्यात्मिक बैज्ञानिक
बहुबिध बिन्यासे पबित्र,
बाहुथिबु कर्ण्णधार
भबार्ण्णबे तो कर्म-बहित्र ।
राजा प्रजा धनी निःस्व
उच्च नीच भेद नाहिँ किछि,
गुणी मानी सबु सम
मो समीपे बिलय भजिछि ॥

मोर एक तन्तु बळे
क्रीड़नक जीबजन्तुमान,
मोहरि गभीर गर्भे
लय लभे सकळ सन्तान ।
बिध्वस्त हेलेहेँ नाना
बिपर्य़्यये बिपुळा पृथिबी,
अक्षय अमर मुहिँ
सर्बग्रासी काळ चिरञ्जीबी ॥


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(Published in “Vyāsanagar”, Vol.-1, March 2005, Vyasanagar, Jajpur Road, Orissa )
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Saturday, May 23, 2009

Purushottama-Gītikā (Sanskrit Song): पुरुषोत्तम-गीतिका : Dr.Harekrishna Meher

Purushottama-Gītikā (Song for Lord Jagannātha)  
Sanskrit Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from Sanskrit Kāvya ‘Mātrigītikāñjalih’)
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पुरुषोत्तम-गीतिका 
गीत-रचना तथा स्वर-संयोजना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’ - काव्यतः)
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प्रणमामि तम्,
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ;
जन-हृदय-मन्दिर-नन्दितम् ।
जगन्नाथं परात्मानं
सर्व-तनुषु स्पन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥
(ध्रुवम्) 
*
पुरुषोत्तमं लीलामयम्,
अविनाशिनं विभुमव्ययम् ।
धृत-दारु-दैवत-विग्रहम्,
प्रणव-रूपं प्रणमाम्यहम् ।
ब्रह्म हंसं स्वप्रकाशं
श्रुतिषु सत्प्रतिपादितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (१)
*
बलभद्र-भद्राभ्यां समम्,
नम चित्त ! तं पुरुषोत्तमम् ।
त्रिगुणात्मकं रत्‍न-त्रयम्,
भूर्भुवःस्वः – परमालयम् ।
दीनबन्धुं दयासिन्धुं
भक्ति-पुष्प-निवेदितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (२)
*
वारांनिधि-तट-निकेतनम्,
भज पतितपावन-केतनम् ।
श्रित-नीलगिरिवर-कन्दरम्,
सत्यं शिवं चिर-सुन्दरम् ।
शङ्‍खनाभि- क्षेत्र-सुभगं
साधु-जनाभिनन्दितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (३)
*
शरणार्ति-हरण-परायणम्,
प्रभुमनन्तं नारायणम् ।
वृत-जगज्जननी-सुस्मितम्,
वासुदेवं विनतोऽस्मि तम् ।
आदिकन्दं श्रीमुकुन्दं
विबुध-वृन्दामोदितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (४)
*
तुलसी-लसित-सीतावरम्,
चैतन्य-नुत-मुरलीधरम् ।
भैरवं भजे गजाननम्,
खग-वाहनं ससुदर्शनम् ।
इन्दिरेशं दिव्य-वेशं
बुद्ध-रूपमनिन्दितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (५)
*
रथ-महोत्सवे जगत्पते !
त्वयि मन्दिराद् बहिरागते ।
जन-लोचनं गोविन्द ! ते,
शुभ-दर्शन-रसं विन्दते ।
नन्दिघोष- स्यन्दन-गतं
शङ्‍ख-घण्टा-नादितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (६)
*
त्वयि धर्म-सकलं लीयते,
त्वयि कर्म-सकलं क्षीयते ।
चरणं तव कलुष-वारणम्,
शरणं हरे ! मम तारणम् ।
भवतु नामा- मृतं शिवदं
स्वान्त-तन्त्री-स्यन्दितम् ।
प्रणमामि तं भुवि वन्दितम् ।
प्रणमामि तम् ॥ (७)
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(इयं गीतिका रूपक -तालस्य अथवा दीपचन्दी -तालस्य मध्य-लयेन परिवेषणीया ।)
* * * * * 

English Translation by the Author
Dr. Harekrishna Meher 
*
Purushottama-Gītikā
(Song for Lord Jagannātha)
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My salutations to Lord Jagannātha,
the Supreme Self throbbing in all the bodies.
He is adored all over the world
and is delighted in the heart-like
temples of all the beings. (0)

Salutations to the Prime Self of all selves.
He is figured with divine deeds.
Indestructible and all-encompassing is He.
The body of wooden frame He has borne.
He is the form of OM, the sacred chant.
He is Swan-like Brahman, self-shining,
rightly enumerated in the scriptures. (1)
*
O Mind ! Bow down to the Supreme God
Purushottama Jagannātha
along with Balabhadra (elder brother)
and Subhadrā (younger sister),
the trio characterized with three guņas
(sattva, rajas and tamas), and
the three Gems of Jainas and Bauddhas.
He is the supreme abode of Bhūh (world),
Bhuvah (firmament) and Svah (heaven).
He forms the friend of the wretched.
He is the ocean of mercy and is prayed
with the offerings of flowers of devotion. (2)
*
O Mind ! Deliberate on the Lord,
whose holy abode is situated near the shore
of the southern ocean,
the Lord, who bears the banner of
sanctifying the down-trodden,
and who resides in the temple-cave
of Nila-giri, the black mountain.
He is Truth, Good and Eternal Beauty.
He is attractive in Śańkha-Nābhi-Kshetra
(the region of the navel of conch) Puri.
He is congratulated by the noble ones. (3)
*
My salutations to the Lord
who is ever exerted to alleviate
sufferings of those consigned to Him.
He is limitless. He is Nārāyaņa, who has heartily
accepted the sweet smiles of Lakshmī,
the Mother-goddess of the world.
He is omnipresent, the prime root of the beings.
He is the auspicious bestower of emancipation,
and is exhilarated by gods and the wise. (4)

I pray to Lord Jagannātha, who is ŚrīRāma,
the consort of Queen Sītā, blissfully
eulogized by the great devotee Tulasīdāsa.
He is the flute-player Krishna
praised by the great saint Chaitanya.
He is Bhairava, the deity of tantric process.
He is the elephant-headed god Ganeśa.
Garuđa, the bird-king, is His conveyance.
He is wielder of the discus Sudarśana
and the husband of Goddess Lakshmī.
He is the form of all the divinity and
is known as the unblemished form of Buddha,
the Enlightened One. (5)
*
O Lord of the worlds ! On the sacred
occasion of Ratha-Yātrā (Chariot Festival),
while you come out from the temple,
O Govinda ! the eyes of people are fortunate
to relish the bliss of your auspicious vision.
O Lord ! you are mounted on the chariot
Nandighosha and are accompanied with
the joyous sound of conches and bells. (6)
*
O Hari, the destroyer of all evils !
All virtues mingle in Thee.
All activities perish in Thee.
Thy feet that eradicate all sins
are my sole shelter and saviour.
May the nectar of thy names
bestowing well-being for ever
flow from the strings of my inner heart.
Salutations to Lord Jagannātha
heartily worshipped by all. (7) *
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(Extracted from ‘Mātrigītikāñjalih’ Kāvya of Dr. Harekrishna Meher)
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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Wednesday, May 20, 2009

Kumbha-Kāmodī : Binod C. Naik’s Oriya Poem / Hindi Version : H K Meher

KUMBHA-KĀMODĪ
Original Oriya Poem by : Dr. Binod Chandra Naik
Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher

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(For convenience of general readers,
Original Oriya letters are shown here in Devanāgarī script.)
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कुम्भ-कामोदी
मूल ओड़िआ कविता : डॉ. विनोद चन्द्र नायक
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तुमे कहिथिल आसिब सभिएँ शो‍इले
मेघ-बळयित चन्द्र आकाशे न‌इँले ।
तुमे कहिथिल, नीळ करबीर
छाया-तळे हेले रजनी गभीर,
हंस-मिथुन किनारे नदीर
कुम्भ-कामोदी गाइले ।
तुमे कहिथिल आसिब सभिएँ शो‍इले ॥ (१)
*
तुमे त आसिन, अस्तगामी ए चन्द्र,
काक-ज्योत्स्नारे कूज‌इ काकळी मन्द्र ।
छायापथ-तीरे रेबती-तारार
लीन नीळालोक ; तन्द्राहरार
गणे मुँ रजनी – प्रहर सजनी !
नयन आर्द्र सलिळे ।
तुमे कहिथिल आसिब चन्द्र न‌इँले ॥ (२)
*
देखा हो‌इथिला बेळे मुँ देखिछि सखि रे !
कज्जळ-रेखा अङ्‌कित थिला आखिरे ।
नीळ-मेघी पाट तनु-तटे थिला
लळित बक्ष नर्त्तन-शीळा,
नीबी-बन्धन सरजि कि लीळा
मुकुळि थिला त पहिले ।
तुमे कहिथिल आसिब सभिएँ शो‍इले ॥ (३)
*
बेश-रचना त शेष हो‌इथिला केबळ,
बादामी शाखारे थिला चन्द्रिका धबळ ।
बन्द बि थिला कळ गुञ्जन
घरे घरे घरणीर ; खञ्जन –
पक्षीर सम तब शिञ्जन
शुभुथिला, आस कहिले ।
तुमे कहिथिल आसिब चन्द्र न‌इँले ॥ (४)

*
हीरा-दीप-जळा दूरे केउँ नीळ पाहाड़े
निभे निद-बाउळारे चन्द्र य़ा उहाड़े ।
तार गह्‍वर - तळे शेय़ पारि
पड़िल कि शो‍इ हे राजकुमारी !
तन्द्राहत मो दरदी कण्ठ
न सरे ए ब्यथा गाइले ।
तुमे कहिथिल आसिब सभिएँ शो‍इले ॥ (५)
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कुम्भ-कामोदी
मूल ओड़िआ कविता : कवि बिनोद चन्द्र नायक
हिन्दी-रूपान्तर : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

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तुमने कहा था आओगी सबलोग जब सो जायें,
बादल से घिरा चाँद जब अम्बर में ढलने चले ।
तुमने कहा था, नील करवीर की छाँव तले
रातें जब गहरी हो जायें ;
नदी-किनारे हंस-युगल जब कुम्भ-कामोदी गायें ।
तुमने कहा था आओगी सबलोग जब सो जायें ॥ (१ )
*
तुम तो आईं नहीं,
डूबने जा रहा यह चन्द्रमा ;
बिखर रही काक-ज्योत्स्ना में यहीं
++
मन्द्र काकली की मधुरिमा ।
छाया-पथ के किनारे हो चुकी लीन
नील ज्योति रेवती तारा की ;
सजनी ! गिन रहा हूँ तन्द्राहीन
मेरा रात्रि-प्रहर और कितना बाकी ।
भीगे हैं नयन, बहता अश्रु-जल जाये,
तुमने कहा था आओगी चाँद जब ढल जाये ॥ (२ )
*
जब भेंट हुई, सखी ! है मैंने देखा,
नैनों में थी अंकित काजल की रेखा ।
लगता था तुम्हारे
तन के किनारे
बादल-सा नीला पाट-वस्‍त्र प्यारा ;
नृत्य-तत्पर था लालित्यभरा उर तुम्हारा ।
शिथिल थी हो गयी
नीवी-ग्रन्थि पहले से ही
रचकर क्या क्या लीलायें ।
तुमने कहा था आओगी सबलोग जब सो जायें ॥ (३ )
*
संपन्न हुई थी केवल वेश-रचना अपनी,
बादामी डाल पर थी उजली चाँदनी ।
घर-घर में गृहिणी की मधुर गूँज भी
बन्द हो चुकी थी तभी ।
खञ्जन पंछी की-सी तुम्हारी पायल की छमछम
दे रही थी सुनाई मनोरम ।
‘आओ’ कहने पर कहा था तुमने
कि आओगी चाँद जब लगे ढलने ॥ (४ )
*
हीरे का दीपक जलता
दूर किसी नीले पहाड़ पर,
जिसके पीछे चाँद छुपता
नींद में बावला होकर ।
उसकी गुफा के तले बिछाकर शय्या
अरी राजकुमारी ! तुम सो गईं क्या ?
तन्द्राहत मेरा दर्दभरा कण्ठ अपना
गाता रहे जितना,
समाप्त होतीं नहीं ये व्यथायें ।
तुमने कहा था आओगी सबलोग जब सो जायें ।। (५ )

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पाद-टीका : (२)
+ + काक-ज्योत्स्ना = चाँदनी जो काकों के मन में प्रभात का भ्रम जगाती है ।
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अनुवाद-काल : दिनांक २- २- १९९३, भवानीपाटना ।
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Monday, May 11, 2009

Sanskrit Song “Kavi-Gītikā” / H K Meher

Kavi-Gītikā (Song for the Poet)  
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
(Extracted from ‘Mātrigītikāñjalih’ Kāvya)
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कवि-गीतिका  : 
रचना तथा स्वर-संयोजना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
(‘मातृगीतिकाञ्जलिः’- काव्यतः )
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अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ;
भवदनुभावः

प्रभूत-भावः
कम्र-कोमलामलच्छविः ।

अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (ध्रुवम्) 
*
नव-रस-नव्या
श्रुति-गुण-भव्या
सुसेवितव्या
तव कवनी ;
सुविमल-वर्णा
विजित-सुवर्णा
सुवितत-पर्णा
सनातनी ।
तिमिर-विदारण-दिव्य-रविः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (१)
*
सुविद्यमाना
मधुरोद्‌गाना
वरं दधाना
सरस्वती ;
रसिक-वल्लभं
भुवन-दुर्लभं
कवन-सौरभं
वितन्वती ।
जाड्‍यं नियतं यत्र हविः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (२)
*
भ्रान्ति-कर्शनं
क्रान्त-दर्शनं
सन्निदर्शनं
निरङ्‍कुशम् ;
जगत्यनल्पं
सुम-गिरि-कल्पं
प्रतिभा-तल्पं
वितरतु शम् ।
काव्य-नभश्‍चर-सुन्दर-विः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (३)
*
ऋत-सन्धाने
शास्त्र-निधाने
सृष्टि-विधाने
प्रजापतिः ;
नय-कमनीया
सम्मननीया
भुवि महनीया
शुभा मतिः ।
कलमस्य पुरो नमति पविः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (४)
*
छन्दःसदना
रस-स्यन्दना

विश्‍व-वन्दना
नान्दनिकी ;
सुधा-सुधर्मा
शोभा परमा
रङ्ग-सङ्गमा
माङ्गलिकी ।
सुगम-सुमार्गा पदाटविः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (५)
*

मञ्जुल-घोषा
विशेष-कोषा
मृदुला योषा
तव कविता ;
युग-रुचि-यागा
नवानुरागा
प्रसृत-विभागा
पल्लविता ।
सुविदां प्रभवति तव पदविः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (६)
*
अद्‍भुत-भूतिः
सदानुभूतिः
सरसोद्‍भूतिः
काव्य-कला ;
मसी-तरण्या
बुध-जन-गण्या
वृत-लावण्या
समुज्ज्वला ।
कालिदास-भाः सभारविः ।
अमर-कविस्त्वं प्रवर-कविः ॥ (७)

* * *     

(इति  कवि-गीतिका)
*
(इयं गीतिका प्रायः कहरवा-ताल-मध्यलयेन परिवेषणीया ।)
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English Translation :
 http://hkmeher.blogspot.in/2012/12/kavi-gitika-drharekrishna-meher.html
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Saturday, May 9, 2009

Sanskrit Song ‘Mātŗi-Gītikā’ (मातृगीतिका): Dr.Harekrishna Meher

Mātri-Gītikā  (Song for the Mother)  
Lyrics and Tuning by : Dr. Harekrishna Meher  
*
(Composed in my self-innovated original new lyrical 
maatraa-metre, which has been named 'Bhavyaa')

*
(Extracted from ‘Mātrigītikāñjalih’ Kāvya)
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मातृगीतिका  
गीत-रचना तथा स्वर-संयोजना : डॉ. हरेकृष्ण-मेहेरः  
(मातृगीतिकाञ्जलिः’-काव्यतः )
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जयतु जननी जन्म-भूमी
भव्य-भुवनं भारतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं

सुन्दरं धामामृतम्,
भव्य-भुवनं भारतम् ॥
(ध्रुवम्)
*
धरित्रीयं श्यामला,

कामधेनुः कोमला ।
रत्न-गर्भा शाश्वती,

कल्प-वल्ली भास्वती ।
विन्ध्य-भूषा सिन्धु-रशना हिमगिरि-शिखा शर्मदा,
रम्य-गङ्गा-सङ्ग-यमुना महानदीह नर्मदा ।
कर्म-तपसां सार्थ-तीर्थं प्रकृति-विभवालङ्कृतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम् ।
भव्य-भुवनं भारतम् ॥ (१)
*
बिभर्त्ति भूति-सम्पदम्,
राष्ट्रमिदं हि शं-पदम् ।
वैरि-लोचन-बाष्पदम्,
सत्‍कलाया आस्पदम् ।
सांस्कृतिक्या एकतायाः पुञ्जिता सञ्जीवनी,
मङ्गलमयी रङ्ग-ललिता निखिल-सुखदा लेखनी ।
प्रेम-जगतां जैत्र-गीतं विबुध-हृदये झङ्कृतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम् ।
भव्य-भुवनं भारतम् ॥ (२)
*
साभ्युदयता-द्योतिनी,
सदाचार-विवर्द्धिनी ।
लभ्यते सा सभ्यता,
भाति दिव्या नव्यता ।
चतुर्वर्गद-शास्त्र-मार्गा यत्र विद्या विद्यते,
विश्व-मध्ये यदध्यात्मं तत्त्व-सारं कीर्त्त्यते ।
भारतीये मूल-मन्त्रे जयति सत्यं नानृतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम् ।
भव्य-भुवनं भारतम् ॥ (३)
*
भूमिरियं सुचर्चिता,
धीर-वीरैरर्चिता ।
प्राच्य-परिचय-गौरवा,
शुभा प्रतिभा-वैभवा ।
यत्र भाषा-वेष-भूषा-रीति-चलनै-र्विविधता,
तथाप्येका दीप्यमाना राजते जातीयता ।
एक-मातुः सुताः सर्वे भ्रातृ-साम्यं सत्‍कृतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम् ।
भव्य-भुवनं भारतम् ॥ (४)
*
स्वार्जितैरूर्जस्वलम्,
ज्ञान-दीपैरुज्ज्वलम् ।
शान्त्यहिंसा-सद्‍बलम्,
त्याग-सेवा-पुष्कलम् ।
यत् त्रिरङ्गं ध्वजं विदधद् वर्षमार्षं पूज्यते,
लोकतन्त्रं सार्वभौमं स्वीय-भूम्ना मान्यते ।
ऐक्य-मैत्री-भाव-सूत्रं परम्परया सम्भृतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम् ।
भव्य-भुवनं भारतम् ॥ (५)
*
यद् “वसुधा कुटुम्बकम्”,
निगदितं दिग्‌दर्शकम् ।
अम्बर-चुम्बि-चुम्बकम्,
सकल-मानस-कर्षकम् ।
मानविकता-मानयित्री यत्र वागविनश्वरा,
स्वर्ण-वर्णा प्रीति-पूर्णा महामहिमा सुस्वरा ।
विश्व-बन्धो-र्मधुर-गन्धं यशो यस्मिन् विस्तृतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम् ।
भव्य-भुवनं भारतम् ।
भारतम्, भारतम्, भारतम् ॥ (६)
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(इयं गीतिका प्रायः रूपक-ताल-मध्य-लयेन परिवेषणीया)

*
English Translation : 
http://hkmeher.blogspot.in/2012/12/matri-gitika-drharekrishna-meher.html
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Complete ‘Matrigitikanjalih’ Kavya: 
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